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उम्हें देखा था जब मैंने
आह सीने में आयी थी,
वो मौसम क्या ही मौसम था
नज़र उनसे मिलायी थी।

झटककर बाल कांधे से
वो सीधे चलकर आयी थी,
कहा कि आप कैसे है
हलक में जान आयी थी।

उजियारे पाख सी रंगत
गुलाबी गाल की संगत,
कहे कैसे कि कैसे है!
बेहोशी दिल मे छायी थी।

वो उनके हुस्न की माया
अदा क्या खूब पायी थी
वो ही मेरी ग़ज़ल भी थी
वो ही मेरी रूबाई थी।

वो उनके रूप को सहना
दूर से बैठकर तकना
उन्हीं के ख्याल में डूबी
कई रातें बितायी थी।

मेरे अंतर की हलचल को
समझ जैसे वो पायी थी
मखमली उंगलियां
मेरी हथेली पर फिरायी थी।

था सुखमय नींद में सोया
सजीले स्वप्न में खोया
थी थिरकन अब भी हाथों में
पर संज्ञा लौट आयी थी।

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प्रियदर्शी प्रतीक
28.05.2020
दलसिंहसराय, समस्तीपुरम

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