भारत-भाग्य-विधाता

भारत-भाग्य-विधाता

नींव बनकर वह पत्थर
जो भूमि में दब जाता है,
जिसके कंधों पर चढ़कर
भवन भव्य इठलाता है।।

जो बैठा अंतिम कतार में
बारी गिनता जाता है,
नाम पर जिसके चलता रुपया
दस पैसा रह जाता है।।

मेहनतकश श्रमजीवी जो
अपनी देह गलाता है,
जिसकी विपन्नता का वैभव
हर बुद्धिजीवी गाता है।।

अमर सपूतों की गणना में
जो पीछे रह जाता है,
अंतिम था, अंतिम है
अंतिम ही जो रह जाता है।।

वही नींव में गड़ा हुआ
अंतिम कतार में पड़ा हुआ,
श्रम पर पोषित, श्रम पर आश्रित
भारत- भाग्य- विधाता है।।

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प्रियदर्शी प्रतीक
16.05.2020
दलसिंहसराय, समस्तीपुरम
(यह कविता श्री रघुवीर सहाय की कविता भारत-भाग्य-विधाता से प्रेरित हो लिखी गयी है।)

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