भारत मे प्रवासी, हम भारत के लोग: कोरोना त्रासदी के संदर्भ में

कोरोना की त्रासदी से उपजे लॉक डाउन के दौरान सामने आती हुई तस्वीरे,भारतीय संविधान और उसकी सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय को सुलभ करने की मंशा को मुँह चिढ़ाती दिखती है। इससे भी दर्दनाक बात यह होती है कि इन तस्वीरों को साझा करते लोगो को इनमें "प्रवासी" मजदूर दिखायी पड़ते है, भारतीय नागरिक नहीं।

तकनीकी संदर्भों में तो आज भारत का हर तीसरा व्यक्ति "प्रवासी" है लेकिन सामान्य समझ "प्रवासी" उसे ही समझती है जो दूसरे देश जा बसा हो। फिर कौन भला ये चाहता होगा कि अपने ही देश मे उसे प्रवासी का दर्जा दिया जाये। लेकिन शहर के बाहर झुंड में बैठे, तपती धूप में सर पर अपनी जरूरतों का बोझा डाले चल रही भीड़ को इस देश ने "प्रवासी मजदूर" के नाम से वर्गीकृत कर दिया है।

कोरोना ने जिस भय के वातावरण को जन्म दिया उसमें जिस तरह की छटपटाहट जनता और सरकार दोनों के स्तरों पर दिखायी पड़ी वो पूरी तरह स्वाभाविक थी। लोगों की अपने घर पहुँचने की तड़प भी स्वाभाविक थी। अस्वभाविक था उनकी तड़प को न समझना, उनकी असहायता, दीनता और दुर्भाग्य पर जन्मा सामाजिक प्रतिरोध।

छोटे छोटे बच्चों को कंधे और गोद मे लादकर चलते हुए लोगों की बेबसी से भी ज्यादा कचोटती है वो लापरवाह टिप्पणी जो इन्हें नासमझ साबित करती है और लाचारी की कमजोरी से मुरझाये चेहरे को महामारी फैलाने के दोष से मढ़ देती है।

नींद से निढाल पड़े बच्चे को ट्राली बैग पर टिका कर रस्सी के खिंचते हुए आगे बढ़ती जाती माँ, किसी महानगर की सीमा पर बैठकर रोता हुआ आदमी, सिर्फ गरीबी, कमजोरी और बेबसी का बयान ही नही है। ये बयान है उस शासन तंत्र की विफलता का जिसमें नागरिक अपने ही देश मे खुद को परदेशी समझने पर मजबूर होता है, ये बयान है उस आशा के समाप्त होने का जो प्रजातंत्र में, "प्रजा" को "तंत्र" से होती है।

कोरोना वायरस ने हमारी दुनिया को कितना नुकसान पहुँचाया है जब कभी भी इसका आकलन किया जायेगा, वो आकलन तब तक सही नही होगा जब तक उसमें इन दिनों उपजी उम्मीदों की टूटन, व्यवस्था से दुराव, मानसिक क्षोभ व कड़वाहट को समायोजित नही कर लिया जाता!!!

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प्रियदर्शी प्रतीक
17.05.2020
दलसिंहसराय, समस्तीपुरम

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