तुम
मुद्दतों से बेनूर था
न जाने किसका कुसूर था
नजर इनायत हुई तुम्हारी
सोयी किस्मत चमक उठी है।
उड़ती रंगत ख़बर में थी
बेरुखी ही नजर में थी
प्यार की बरसात आयी
हमारी हस्ती दमक उठी है।
बेख़बर था जमाना हमसे
जफ़ा नजर से बरस रही थी
तुम्हारी हसरत की जुम्बिशो से
ये उजड़ी बगिया महक उठी है।
कदम हमारे बहक रहे थे
के रास्तों से भटक रहे थे
तुमने हाथों में हाथ थामा
उम्मीद की लौ जल उठी है।
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प्रियदर्शी प्रतीक
26.05.2020
दलसिंहसराय, समस्तीपुरम
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