सबरीमाला, अयप्पा स्वामी और अंधविश्वास
स्वामी अयप्पा ब्रह्मचारी है, यह एक विश्वास है उनके भक्तों का। सहज तौर पर, स्त्री संग निषेध माना गया है ब्रम्हचर्य का व्रत लेने वालों के लिये। हिन्दू धार्मिक व्यवस्था, अपने भगवान की मूर्ति को सजीव मानती है। भारतीय न्याय व्यवस्था ने भी हिन्दू देवता की मूर्ति को व्यक्ति माना है। हर देवी देवता के रुचिकर भोग है, अस्त्र शस्त्र है, रंग है, पुष्प है, पूजा विधि है। भक्ति उसी स्वरूप में होती है। भगवान की मूर्ति को जीवित व्यक्ति के समान समझा और जाना जाता है।
यदि भगवान की मूर्ति एक व्यक्ति के समान है तो उसकी संपत्ति हो सकती है, घर हो सकता है, वस्त्र हो सकते है, रूचियां हो सकती है। क्या किसी ब्रह्मचर्य के व्रती को स्त्री संग या दर्शन के लिये बाध्य किया जा सकता है??? यदि नही तो ब्रम्हचर्य का व्रत धारण किये भगवान को कैसे बाध्य किया जा सकता है????
भक्त कह रहा है कि स्त्री को प्रवेश मत दो ब्रम्हचारी के दरबार मे। जिन्हें अयप्पा की भक्ति से कोई लेना देना नही वो भक्तो के विश्वास की परीक्षा लेना चाह रहे है, भक्ति की परीक्षा लेना चाह रहे है, अंध विश्वास बता रहे है।
हिन्दू धर्म और दर्शन में भक्ति की अनेक शाखाएं है। ऐसा भी नही कि भगवान अयप्पा के मार्ग बंद हो जाने पर भक्ति के अन्य मार्ग बंद हो गए, Religious confinement हो गया!!!!
ऐसे में लैंगिक समता की बात की जाती है!!! परन्तु विश्व की समस्त न्याय व्यवस्थाये यह स्वीकार करती है कि समता (equality) कोई स्टीरियोटाइप व्यवस्था नही है। इसका आचरण देश, काल, वातावरण व पात्र पर निर्भर करता हैं।
केरल में स्वयम महिलाओं द्वारा सबरीमाला में महिलाओ के प्रवेश के विरुद्ध आवाज उठाना, तथाकथित धार्मिक और सामाजिक कार्यकर्ताओं के मुंह पर तमाचा है। ऐसे में सबरीमाला के सन्दर्भ में, शासकीय व संवैधानिक शक्तियों का प्रयोग करके, समता के सिद्धांतों की दुहाई देकर, धार्मिक रीतियों को अंध विश्वास की श्रेणी में खड़ा करना सिर्फ़ और सिर्फ़ शासकीय अनाचार है।
इस अनाचार के विरुद्ध स्वर मुखरित करना ही धर्म है।।
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