नींव और कंगूरा


शहर जब किसान के मड़वे पर
बिखरी चांदनी को कमतर मानेंगे,
अपनी इमारत की बिजली की रोशनी से
उजाले को आंकेंगे,

तो ये समझ लेना

चकाचौंध में उलझी, कंगूरे की ईंट,
नींव की ईंट की मुफलिसी से, शरमा रही है;
अपनी ऊँचाई पर, इतरा रही है,
नींव की अहमियत को झुठला रही है;

शहर और गाँव का, कंगूरे और नींव का
तब बिगड़ेगा संयोजन
जब शहरी चकाचौंध के आगे
लाचार और बेज़ार होगा मासूम देहातीपन


जब सभी ईंटे,
नींव से निकलकर
कंगूरे पर चढ़ने की जिद ठान लेंगी,
नींव में जाने पर हलकान होंगी;

तो न नींव होंगी
न कंगूरा;
न गाँवो में होंगी बसाहट
न शहरों में सबेरा।।

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प्रियदर्शी प्रतीक

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