श्रृंगार की चौखट पर लिखी क्रांति

विह्वल विशाल सागर सी आंखे तुम्हारी,
सपनीली दुनिया की सैर को आतुर दिखती है।

खामोशी की चादर ओढ़े सिले से ये होंठ,
जाने कितनी कहानियां कहने को आतुर है।

पलकों की सिलवटों के बीच से  नज़र आती है,
स्वत्व खोज, जीतने की चाहत।

होंठो के किनारे, दबाई हुई मुस्कुराहट,
खोलना चाहती है संभावनाओं के द्वार।

किन्तु ये दुनियां की रवायतें और सामाजिक रीत,
न सिर्फ बांधती है मन को बल्कि आत्मा के गीत 

खुशियों के दरख्त, लद जाये फूलों से,
सपनों की उड़ान हो, हर फिक्र से आज़ाद।

उससे पहले वो ओढ़ के आती है, रिवाजो का नकाब,
और तोड़ती जाती है, उम्मीदों के मकान।

कुंठित कर, सपनों की चमक,
बोझिल कर, उम्मीदों की मुस्कान।

उभरने से पहले, निखरने से पहले
बुझ सा जाता है, आत्मा का गान।

नकाब को ओढ़ी, भीड़ के साथ
पार्श्व में छुप जाती है, स्वत्व की पहचान।

परन्तु हे आत्मन,

यदि धार के विपरीत होना, मृत्यु का सामिप्य हैं,
तो अंतरात्मा से विमुखता, सृजनात्मकता का अंत है

सोच कर देखो जरा, जीवंतता की प्राणमूर्ति
श्वास का आवागमन ही, जीव की संज्ञा नही है। 

स्वत्व को पाने का हेतु, जगती में स्व की पहचान
निर्विवाद ये मूल तत्व ही, संसार चक्र के है अवधान।

कैसी भी हो दशा, कैसा भी स्वरुप
स्वत्व की प्राप्ति, सदैव हैं अमृत रूप

अतः 

हे,
समाज की आकांक्षाओ की साकार मूरत,
लड़ सको तो लड़ लेना
झूझ सको तो झूझना
हिम्मत के टूटने से पहले
हिम्मत न हारना। 

न ही मिटने देना अपनी
निराकार छाया
अभिनव उम्मीद
अप्रतिम मुस्कान।

क्योकि 

सांसो की अभिरंजना के बीच
जो जीवन, बिन संगीत होगा
आनंद के विपरीत होगा
सब भांति सुशोभित जीवन भी
नैराश्यपूर्ण गीत होगा।

सुनो

जीवन की सरिता, जो इठलाती इतराती बहती जाती है,
तुम्हारी अँखियों के दो समंदर में
खुद को समाती है

उसे स्वत्व के अतिरिक्त
किसी अन्य तत्व से
न बंधने देना 

और 
न ही गिरवी रखना
अपनी अप्रतिम  मुस्कान
सामाजिक रीत की प्रीत की  चाहत में,

अपनी बुनियादी रचना को  समझना सहेजना 
पर मत समेटना अपनी बातों को
अपने अधखुले होंठो के किनारों  में;

जीवन की आभा,
खुद को सामाजिक रीत  की चौखट पर
बिछा देने से न आएगी

न ही प्रज्ञावान
बन सकेगा मन
न ही सरस रहेगा जीवन 

हे
सामाजिक रीतियों
मान्यताओं
अहिमन्यताओ
की आलम्ब

समझो

जब जीवन में सत्य का अवदान होगा
व्यक्ति से समष्टि की पहचान होगी 

स्वत्व का सामाजिकता से सामंजस्य होगा 
रीत की प्रीत से बुनियाद होगी 

तभी स्वत्व की पहचान होगी, विदा होगी भ्राँति 
जब श्रृंगार की चौखट पर लिखी होगी क्रांति।

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प्रियदर्शी प्रतीक

Comments

नीरजः said…
अति सुंदर। यद्यपि विषय मेरे पसंद का नहीं है परन्तु कृति में जो आह्वान किया जा रहा है उसे स्पर्श कर पा रहा हूँ।
सत्याभिमुख सुन्दर कृति

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