"मन मार के जियो "
जी में जो आती है कर गुज़रो कहीं ऐसा न हो
कल पशेमाँ हों कि क्यों दिल का कहा माना नहीं
(पशेमाँ = लज्जित, शर्मिंदा)
अहमद फ़राज़
आज ये पंक्तियां पढ़कर जी थोड़ा सा कुम्हला सा गया हैं। मिड्लक्लास जी होता ही ऐसा हैं, हर पहर दोपहर कुम्हला जाता हैं। याद करने बैठो तो हजारो ऐसी बातें याद आती हैं जब आदमी अपने आप से समझौता करता हैं। अपने एक मित्र (जिन्हें भक्तो ने 'बाबा' की उपाधि दी हैं ) की चारपाई का कोना पकड़ लिया हमने और बात छेड़ दी। बाबा को अपने पुराने मित्र की बात याद आ गयी जो कहते थे कि बाबू जिंदगी में खुश रहने का एक ही फार्मूला हैं ----
"मन मार के जियो "
इसका मतलब ये हैं कि जब भी मन ललचाये कुछ ऐसा करने को या पाने को जो अपनी हैसियत और संसाधनों की परिधि से बाहर जा रहा हैं तो बस मन को काबू में कर लो थोड़ा दबा लो जज्बातो को। उन्होंने कई शास्त्रीय उदाहरण भी प्रस्तुत कर दिए इस विषय में। कहा कि मन को वश में करने की लड़ाई बहुत पुरानी हैं। अर्जुन ने भगवन से ही पूछ लिया था :
चंचलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम्- |
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्- ||
अर्थात् : ( अर्जुन ने श्री हरि से पूछा ) हे कृष्ण ! यह मन चंचल और प्रमथन स्वभाव का तथा बलवान् और दृढ़ है ; उसका निग्रह ( वश में करना ) मैं वायु के समान अति दुष्कर मानता हूँ |
और भगवन ने कहा :
असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रह- ं चलम् |
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्येते ||
अर्थात् : ( श्री भगवान् बोले ) हे महाबाहो ! निःसंदेह मन चंचल और कठिनता से वश में होने वाला है लेकिन हे कुंतीपुत्र- ! उसे अभ्यास और वैराग्य से वश में किया जा सकता है |
अतः सारी लड़ाई ही मन को वश में करने की हैं। यदि अर्जुन ने अपने मन का कहा मान लिया होता तो महाभारत की ऐसी तैसी हो गयी होती। बाबा उवाच कि अगर अहमद फ़राज़ की मान कर चलोगे तो भारतीय दंड संहिता की कोई धारा किसी न किसी धारा से बहती हुई आकर आपके चरणों से लिपट जाएगी। और जब जन्म लिया मिडिलक्लास में तो हाई क्लास की उड़ान मत उड़ो। यह जन्म लिया किस अर्थ अहो , समझो जिससे की यह व्यर्थ न हो। थाना, कचहरी का चक्कर बड़े बड़ो का बुखार उतार देता हैं। बाबा बोलते ही गये, अब मानो तुम्हारे क्लास की लड़की से तुम्हे प्रेम हो जाए और दिल के हर कोने से ये आवाज़ आये कि 'हम तेरे बिन कही जी नहीं पाते' तो क्या हौसले की उड़ान भर सकोगे। फ़राज़ का कहा मानोगे तो लड़की के बाप भाई से तो पिटोगे ही पिटोगे, बाकी तुम्हारे बापजान जो आरती उतारेंगे उसका कोई हिसाब हैं। वो मनोज तिवारी का गाना नहीं सुने हो 'ऊपर वाली के चक्कर में लड़िका खूब पिटायल बा', फिर बाबा कबीरदास को भूल गये जो कहते हैं कि
केसों कहा बिगडिया, जे मुंडे सौ बार
मन को काहे न मूंडिये, जा में विशे विकार
तो अपने मन को काबू में रखना सबसे बड़ी बात हैं। फ़राज़ को जे फरमाना हैं फरमाने दो, अपने दिलो-दिमाग को काबू में रखो।
हमे समझ में आ गया था कि बात बाबा की आत्मा के किसी कोने में जा चुभी हैं। अब अगर एक शब्द भी बोला तो एक प्रवचन का गिलास और गले से उतारना पड़ेगा।
बाबा के प्रवचन का प्रसाद पाकर भी आत्मा तड़पती रही तो रास्ता पकड़ा हमने छैला बिहारी की गली का। छैला बिहारी रुमानियत का दूसरा नाम हैं। हमने अपनी तड़प वहाँ उजागर कर दी। कहते हैं छैला बाबू आखिर दिल भी कोई चीज़ हैं कि नहीं। आखिर प्रेम की महिमा का बखान हम तो नहीं किये, शास्त्रो में किया गया है। अब अगर दिल में कोई अरमान मचल बैठा तो हंगामा क्यों भाई? अपने कबीरदास जी ने ही कहा हैं कि :
अकथ कहानी प्रेम की, कुछ कही न जाए |
गूंगे केरी सरकारा, बैठे मुस्काए ||
छैला बिहारी बमक कर बोले अरे यार बाबा का नाम बाबा भले ही रख दिया गया हो, उनकी समझ का दर्जा दुनियावी किस्म का ही हैं। हर बात को बनिया के तराजू पर फायदे और नुकसान के बाँट रखकर तोलते हैं। शायर की बात को शायराना तर्ज़ पर समझो और लगाओ भी उन्ही बातो में जँहा मिज़ाज़ शायराना हो। शायर जब बोलता है कि दिल में जो आता है कर गुजरो, तो उसके बोलने का मकसद ये नहीं रहा होगा कि तुम उसके शेर को सुबह बिस्तर पर पड़े रहने का आधार बनाओगे। मौजूं बात है कि दिल के अरमानो को आग मत लगाओ। फ़राज़ समझाना चाहता है कि :
जैसे तिल में तेल है, ज्यों चकमक में आग |
तेरा साईं तुझ में है, तू जाग सके तो जाग ||
दिल के अरमानो को आग मत लगाओ। जाग जाओ और लग जाओ। ऐसा मत कर कि दिल तो कुछ और करना चाहता हैं और तू दुनियावी बातो में फँसा पड़ा रहे। बाबा तो ऐसा उदाहरण देता है कि क्या कहा जाये। अब बताओ भगवान ने गीता में कहा हैं कि ना कोई मरता है न कोई मारता हैं। तो क्या इसका उपयोग किसी के गुनाहों को सही साबित करने के लिए करोगे। दिल की आग को बुझाओ मत, अगर दिल कहता है कि चल उनसे मिल तो जो कदम उठ गए उन्हें वापस मत करो। और बेटा मुस्सदी, भले कॉलोनी वाले मुझे रुमानियत का पुजारी मानते हैं पर दिल की लगी के अलावा और भी गम हैं ज़माने में। यश, नाम, शोहरत, दौलत, पद, ताकत भी कोई चीज़ होती हैं। और अरमान इन सबको पाने को भी मचलते हैं ना। अरे जो दिल खोल के जिया उसी ने जहान में नाम कमाया हैं। वरना मन मार के जीते जीते दाल रोटी तो सभी खा लेते हैं।
आँखे चमक गयी, दिल मचल गया कि जब तक जिस्म में ताकत और दिमाग में सोच रहेंगी तब तक हम जी में जो आती हैं कर गुजरेंगे ताकि कल को पशेमाँ ना हो कि दिल का कंहा माना नहीं। तभी बगल से गुजरता पिंटूवा सांड (पिंटू ने पाला पोसा था इसलिए पिंटूवा) बिना कुछ सोचे समझे हमे दरेरता हुआ चला गया। मन में आया कि बस सबक सिखा दे लेकिन उसकी डील -डौल देखकर दिमाग ने सुझाया कि बबुवा:
"मन मार के जियो "
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