"मन मार के जियो" अध्याय 3
सत्य की खोज मे पागल पथिक की सारी जिज्ञासा और अभिलाषा उस समय दम तोड देती हैं, जब बाबा रामदेव के सिखलाये योगासन कि मुद्रा में बैठे हुए; ईश्वर से साक्षात्कार कि उम्मीद से सांसे ऊपर-नीचे करते हुए याद आता है कि नेट पॅक तो डलवाया ही नहीं, Whats App पर मैसेज आते होंगे। दुनियावी जरूरते अक्सर आध्यात्मिक उम्मीदों का गला घोंट देती हैं।
दद्दा से बात करके, कुछ ऐसी अवस्था में ही बड़की भौजी को लहरदार चुनरी ओढ़े पूजा की डलिया लेकर मंदिर की ओर जाते देखकर, लगभग वो अवस्था प्राप्त हो गयी जिसे शायद किसी धर्म में कैवल्य कहते हैं। सकुचाते कदमो से भौजी की तरफ कूच करते हुए, हमने प्रणाम निवेदित कर दिया।
जीते रहो बबुवा, कंहाँ दुनिया POKEMON GO के पीछे भाग रही हैं, गली गली में ढूंढ रही हैं और तुम दद्दा के चक्कर में पड़े हुए हो। भौजी ज्ञान देते हुए बोली- दद्दा जितनी समझ तो Face Book दे देता हैं।
वैसे बात तो मार्के की हैं। भौजी कैसे इतनी अपडेट रहती हैं ये हम अभी तक समझ नहीं पाए थे। और क्या बताये, भौजी को जवाब देने का दिल नहीं करता। लगता हैं कि हाँ में हाँ मिलाने में ही बरकत हैं। फिर भी हमने समझाया कि बात ऐसी है भौजी कि ज्ञान तो फेसबुकवा भी बघारता रहता है लेकिन वंहाँ सिर्फ one way Communication हैं। हमारी बात सुनके ज्ञान थोड़ी देता हैं।
भौजी आगे बढ़ते हुए बोली- तो मिल गया समस्या का हल?
'हल तो आजकल देखने को नहीं मिलते, आजकल तो ट्रैक्टर से जुताई होती हैं- हमने बात बनाते हुए कहा।'
'कोल्हू के बैल मैं समस्या के हल की बात कर रही हूँ।'
'अरे भौजी तुम तो रिसिया जाती हो,रस नही लेने देती हो। कोई समस्या नहीं हैं, ये तो बस मन की मौज है, सत्य की खोज हैं।'
'तो जाओ फिर, हमें भोलेनाथ की खबर लेने दो'- भौजी आगे बढ़ते हुए बोली।
हमने मन ही मन सोचा कि भला हो भौजी का जन्म हिंदुस्तान में हुआ हैं नही तो ईश निंदा के चक्कर में नंदू भैया का घर ही उजाड़ जाता। वैसे इसी सोच के साथ, एक नया विचार दिमाग में कौंधा। आखिर ईशनिंदा, ईश्वर और भक्तों का कैसा समीकरण हैं, कैसा होना चाहिए, इसपर विचार होना चाहिए।
आज शाम को बौड़म भैया की बैठक में यह विषय तो उठाना ही चाहिए।
आप "बौड़म भैया" सुनकर ये मत सोच लीजियेगा कि बौड़म नाम रख देने से भैया की योग्यता पर गाँव वालो ने सवालिया निशान लगा दिया हैं। 'बौड़म' नाम उनके वैसे कामो के आधार पर रखा गया हैं जिसका आधार ढूंढने में दिमाग की चक्करघिन्नी लग जाती हैं। वैसे तो उनकी बातों से आप स्वयं ही उनका चरित्र चित्रण कर लेंगे। लेकिन बाबा कहते हैं कि किसी आदमी को समझना हो तो उसकी बातों को नहीं बल्कि उसके कामो को आधार बनाओ।
तो हम थोड़ा सा परिचय करा दे बौड़म भैया का। बौड़म भैया इस गाँव के पहले वकील हैं और वकालत भी इधर उधर से नहीं बल्कि काशी नगरी के प्रख्यात काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से पास की हैं। लेकिन वकालत के पैतरों से मन खिन्न हो जाने से राजनीति का दुर्व्यसन पाल बैठे हैं। इनका असली नाम श्री गिरिजा शंकर हैं परंतु इन्होंने बौड़म की उपाधि को LL.B. की डिग्री की तरह धारण किया हैं। और गांव के नवजात भी इनको इसी नाम से जानते और पुकारते हैं।
गांव से सात कोस दूर दूर तक बौड़म भैया की ख्याति उस दौर में फ़ैल गयी थी जब उन्होंने उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की इंटरमीडिएट की परीक्षा "विश्व इतिहास" विषय से पास की। जानकारी के लिए बता दूँ कि उत्तर प्रदेश के विद्यालयों में परीक्षा का फॉर्म सभी विद्यार्थी एक साथ क्लास में बैठ के भरते हैं। फार्म में ढेर सारे विषय जमघट बना के बैठे रहते हैं। विषयो का जमघट देख के विद्यार्थी दुविधा में होते हैं कि "गुरु गोविन्द दोउ खड़े, काके लागु पाय", ऐसी दशा में गुरूजी रूप बदल के 'गोविन्द' बन जाते हैं और "बलिहारी गुरु आपने, गोविन्द दियो बताय" के तर्ज पर किन किन विषयो पर बलिहारी जाना है, बता देते हैं।
जब बौड़म भैया अपनी जवानी की दहलीज अर्थात इंटरमीडिएट की परीक्षा देने की उम्र में थे, वो दौर छोरा गंगा किनारे वाला यानी हमारे मिलेनियम सुपर स्टार अमिताभ बच्चन का था (वैसे उनका दौर आज भी कायम है परंतु 'दौर' शब्द का प्रयोग उम्र के उस काल को दिखाने के लिए करते हैं जब शरीर में जवानी की उमंग होती हैं और मौका हाथ लगने पर भगवान से भी भिड़ जाने की तरंग होती हैं)। उस दौर में जब सुपरहिट फिल्म दीवार, सिनेमाई अंदाज में अमिताभ बच्चन की भगवान से बगावत को जायज ठहरा रही थी; बौड़म भैया की गुरु से बग़ावत कोई बड़ी बात नहीं थी। बौड़म भैया ने सोचा पढ़ना हैं तो 'विश्व का इतिहास' पढ़ा जाये, सिर्फ भारत का इतिहास पढ़कर अपने को विश्व के इतिहास से विरत रखना, स्वयं को 'कुँए का मेढ़क' बनाना हैं। मेंढक का स्वरुप याद करते ही उनका मन, मन-ही-मन लसलसा गया। इसे नीति विरुंद्ध जानकार, अपनी समझ को गुरूजी की समझ के ऊपर समझकर उन्होंने 'विश्व इतिहास' विषय का चुनाव किया।
पर जिस तरह पुराने ज़माने में लोग अपना सोना-चांदी ज़मीन में दबा के भूल जाते थे और बाद किसी भाग्यवान के खेत में खजाना मिलने पर, "खेत और खेत का मालिक" नजदीकी पुलिस थाने, पुरातत्व विभाग और गांव के लोगों के लिए खोज और चर्चा का विषय बन जाते हैं। ठीक उसी तरह से, समय बीतने के साथ 'विश्व इतिहास' का विषय के रूप में चुनाव, बौड़म भैया के सीने में राज की तरह दफ़न हो गया।
आप ये सोचियेगा कि बौड़म भैया के घर वाले इन बातो से अनजान कैसे रह गये। तो आप की जानकारी के लिए बता दूँ कि ये वो जमाना था जब बच्चे लतियाने के बाद विद्यालय भेजे जाते थे और विद्यालय से लौटने पर भी अक्सर ऐसे ही सम्मानित होते थे। ऐसा नहीं था कि बच्चे को लाड प्यार से स्कूल बस तक छोड़ने के लिए घर में किसी की जिम्मेदारी तय होती थी। पाठ्यक्रम में लिखित तौर पर Extra-Curricular क्रियाकलाप का कोई जिक्र नही होता था लेकिन विद्यालय में एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पेड़ पर चढ़ने, तालाब में तैरने, आम तोड़ने और गिल्ली डंडा खेलने की व्यावहारिक शिक्षा दे दी जाती थी। न तो इंटरनेट था और न ही स्मार्ट फ़ोन। तो इन्ही कारणों से, विषय के चुनाव की जानकारी तब तक किसी की जानकारी में नहीं आयी जब तक इम्तिहान का दिन नहीं आ गया।
इम्तिहान के दिन भी सभी विद्यार्थी अपनी जगह पर बैठ गए थे, प्रश्न पत्र बांटा जा चूका था। लिखना शुरू करने की घंटी अभी बजी नहीं थी। मुन्ना सिंह अपनी जगह पर खड़े हो कर गुरूजी से उलझ गए- गुरूजी पेपर सिलेबस के बाहर हैं। गुरूजी ने कान उमेठ कर समझाया जब साल भर कक्षा के बाहर रहोगे तो पेपर तो बाहर का ही लगेगा ना- बैठ जाओ चुप-चाप।
मुन्ना सिंह पुरे आत्म विश्वास से चित्रा गाइड से पुरे आठ प्रश्न पढ़ कर आये थे। थोड़ी देर सकते में आ गए कि गलत गाइड तो नहीं पढ़ लिये। लगे बौड़म भैया को कोहनियाने - गुरु अपना धड़ाधड़ लिखे जा रहे हो, हमको सब गलत प्रश्न रटवा दिये।
बौड़म भैया दोस्ती पर लांछन बर्दाश्त नही कर पाये। मुन्ना सिंह का पेपर देखने लगे और उत्तेजना में चिल्ला पड़े- गुरूजी सही में, मुन्ना के पेपर में अल्लाउदीन खिलीजी की जगह नेपोलियन के सैन्य संगठन के बारे पूछ लिया हैं !
गुरूजी दौड़ पड़े, हल्ला मच गया। परीक्षा कक्ष में प्रिंसिपल साहेब बोले- अरे सब पर्चा तो बोर्ड ऑफिस से आया हैं, एक पर्चा अलग कैसे निकल गया। गुरूजी मिमियाए - उ का हैं कि राम किशुनवा बोले रहा की एक लिफाफा अलग हैं लेकिन हम जल्दी में देखे नहीं। आनन-फानन में सारे कागजात निकले गए। ई पर्चा तो गिरिजा शंकर का हैं- गुरूजी कसमसाये- ई बौड़म जँहा रहेगा बवाल काटता रहेगा।
परीक्षा कक्ष में नजारा बदल चुका था। मुन्ना सिंह रटे हुए उत्तर परीक्षा की कॉपी पर उलटते जा रहे थे। बौड़म भैया ने प्रश्न पत्र से उठते बवंडर पर एक नजर मारी। वैसे तो हर परीक्षा एक विप्पति होती हैं, पर इस विपत्ति का ओर छोर नज़र नहीं आता था। गुरूजी सहानभूति आँखों में भर के बौड़म को निहार रहे थे। नज़ारे मिली, नज़र नज़र में प्रश्न हुआ-- कुछ बताएँगे! गुरूजी ने नज़रें झुका ली।
पर वाह रे वीर, हार नहीं मानूँगा- रार नहीं ठानूँगा की तर्ज पर कमर कस के भैया ने एकलव्य की भांति चित्रा गाइड पर बनी माता सरस्वती के चित्र का ध्यान लगाया और शुरू हो गए और तीन घंटो तक बहादुर सैनिक की तरह सभी प्रश्न रूपी दुश्मनो का डट के सामना किया।
बोर्ड ऑफिस से खबर पक्की हो चुकी थी कि पुरे उत्तर प्रदेश में विश्व इतिहास का पर्चा एक विदयार्थी के लिए छपा हैं। अघोषित तौर पर बौड़म भैया को फेल करार दिया जा चूका था। पर रिजल्ट के दिन चारो ओर बौड़म भैया छाये हुए थे। बौड़म भैया ने अच्छे नम्बरो से पास होकर परीक्षा-परिणाम के बड़े बड़े पंडितो की बोली बंद कर दी थी।
एक दिन छैला बिहारी ने भैया की चुटकी लेनी चाही - भैया आज का दौर होता तो आप किसी टीवी चैनल के प्राइम टाइम पर नजर आते, ट्विटर पर धमाका हो गया होता। लेकिन भैया एक डर भी रहता- बिहार के टॉपरों की तरह मामला गड़बड़ा भी सकता था।
भैया ने मामले की गंभीरता को समझा और पार्टी प्रवक्ता की तरह समझाया - छैला, तुम अकबर की सेना में रहे हो?
'नही'
नेपोलियन की ???
'नहीं'
अबे तो अकबर का सैन्य संगठन नेपोलियन के नाम से बता देंगे तो हमारी बात काट दोगे क्या?? ठीक तुम्हारी तरह कोई मास्टर भी हमारे जवाब नहीं काट पाया।
और ये बताओ अभी पप्पू पानवाले की दुकान के सामने, सायकिल वाले को कौनो ठोंक दिया था। जानते हो कि नहीं !! अब सुबह के अख़बार उठा लो, 'आज' पेपर वाले कहते है कि मोटरसाइकिल ने ठोंका हैं, 'दैनिक जागरण' वाले बोलते हैं कि पिंटूवा ने पटका हैं।
भैया पान की पीक लीलते हुए गरमा गए----अब एक दिन पुरानी बात पर दुनिया में एक राय नहीं हैं तो चार सौ साल पुरानी बात उठाकर, कौन ससुरा हमारी डिग्री पे प्रश्नचिन्ह लगाएगा।
छैला पुराने आदमी थे, उनको तत्काल महाकवि घाघ की याद आ गयी:
"घाघ कहे सुन घाघनी, इसी गांव का रहना,
ऊंट बिल्लैया ले गयी, बस हाँजी हाँजी कहना"
जब गांव का बड़ा बागड़-बिल्ला कह रहा है कि ऊंट को बिल्ली उठा ले गयी है, तो पानी में रहकर मगरमच्छ से बैर लेने का कोई फायदा नहीं। बस बोलते रहो की हाँ गुरु, हम देखे थे जब बिल्ली ऊंट को उठा के ले जा रही थी !!
छैला बिहारी ने अपनी सहमति दर्ज करायी "जय हो गुरुदेव"
बैठक जमने में देरी थी, धुंधलका छा रहा था। छैला गुनगुना रहा था।
कथानक जारी।।।।।।।।।।।
दद्दा से बात करके, कुछ ऐसी अवस्था में ही बड़की भौजी को लहरदार चुनरी ओढ़े पूजा की डलिया लेकर मंदिर की ओर जाते देखकर, लगभग वो अवस्था प्राप्त हो गयी जिसे शायद किसी धर्म में कैवल्य कहते हैं। सकुचाते कदमो से भौजी की तरफ कूच करते हुए, हमने प्रणाम निवेदित कर दिया।
जीते रहो बबुवा, कंहाँ दुनिया POKEMON GO के पीछे भाग रही हैं, गली गली में ढूंढ रही हैं और तुम दद्दा के चक्कर में पड़े हुए हो। भौजी ज्ञान देते हुए बोली- दद्दा जितनी समझ तो Face Book दे देता हैं।
वैसे बात तो मार्के की हैं। भौजी कैसे इतनी अपडेट रहती हैं ये हम अभी तक समझ नहीं पाए थे। और क्या बताये, भौजी को जवाब देने का दिल नहीं करता। लगता हैं कि हाँ में हाँ मिलाने में ही बरकत हैं। फिर भी हमने समझाया कि बात ऐसी है भौजी कि ज्ञान तो फेसबुकवा भी बघारता रहता है लेकिन वंहाँ सिर्फ one way Communication हैं। हमारी बात सुनके ज्ञान थोड़ी देता हैं।
भौजी आगे बढ़ते हुए बोली- तो मिल गया समस्या का हल?
'हल तो आजकल देखने को नहीं मिलते, आजकल तो ट्रैक्टर से जुताई होती हैं- हमने बात बनाते हुए कहा।'
'कोल्हू के बैल मैं समस्या के हल की बात कर रही हूँ।'
'अरे भौजी तुम तो रिसिया जाती हो,रस नही लेने देती हो। कोई समस्या नहीं हैं, ये तो बस मन की मौज है, सत्य की खोज हैं।'
'तो जाओ फिर, हमें भोलेनाथ की खबर लेने दो'- भौजी आगे बढ़ते हुए बोली।
हमने मन ही मन सोचा कि भला हो भौजी का जन्म हिंदुस्तान में हुआ हैं नही तो ईश निंदा के चक्कर में नंदू भैया का घर ही उजाड़ जाता। वैसे इसी सोच के साथ, एक नया विचार दिमाग में कौंधा। आखिर ईशनिंदा, ईश्वर और भक्तों का कैसा समीकरण हैं, कैसा होना चाहिए, इसपर विचार होना चाहिए।
आज शाम को बौड़म भैया की बैठक में यह विषय तो उठाना ही चाहिए।
आप "बौड़म भैया" सुनकर ये मत सोच लीजियेगा कि बौड़म नाम रख देने से भैया की योग्यता पर गाँव वालो ने सवालिया निशान लगा दिया हैं। 'बौड़म' नाम उनके वैसे कामो के आधार पर रखा गया हैं जिसका आधार ढूंढने में दिमाग की चक्करघिन्नी लग जाती हैं। वैसे तो उनकी बातों से आप स्वयं ही उनका चरित्र चित्रण कर लेंगे। लेकिन बाबा कहते हैं कि किसी आदमी को समझना हो तो उसकी बातों को नहीं बल्कि उसके कामो को आधार बनाओ।
तो हम थोड़ा सा परिचय करा दे बौड़म भैया का। बौड़म भैया इस गाँव के पहले वकील हैं और वकालत भी इधर उधर से नहीं बल्कि काशी नगरी के प्रख्यात काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से पास की हैं। लेकिन वकालत के पैतरों से मन खिन्न हो जाने से राजनीति का दुर्व्यसन पाल बैठे हैं। इनका असली नाम श्री गिरिजा शंकर हैं परंतु इन्होंने बौड़म की उपाधि को LL.B. की डिग्री की तरह धारण किया हैं। और गांव के नवजात भी इनको इसी नाम से जानते और पुकारते हैं।
गांव से सात कोस दूर दूर तक बौड़म भैया की ख्याति उस दौर में फ़ैल गयी थी जब उन्होंने उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की इंटरमीडिएट की परीक्षा "विश्व इतिहास" विषय से पास की। जानकारी के लिए बता दूँ कि उत्तर प्रदेश के विद्यालयों में परीक्षा का फॉर्म सभी विद्यार्थी एक साथ क्लास में बैठ के भरते हैं। फार्म में ढेर सारे विषय जमघट बना के बैठे रहते हैं। विषयो का जमघट देख के विद्यार्थी दुविधा में होते हैं कि "गुरु गोविन्द दोउ खड़े, काके लागु पाय", ऐसी दशा में गुरूजी रूप बदल के 'गोविन्द' बन जाते हैं और "बलिहारी गुरु आपने, गोविन्द दियो बताय" के तर्ज पर किन किन विषयो पर बलिहारी जाना है, बता देते हैं।
जब बौड़म भैया अपनी जवानी की दहलीज अर्थात इंटरमीडिएट की परीक्षा देने की उम्र में थे, वो दौर छोरा गंगा किनारे वाला यानी हमारे मिलेनियम सुपर स्टार अमिताभ बच्चन का था (वैसे उनका दौर आज भी कायम है परंतु 'दौर' शब्द का प्रयोग उम्र के उस काल को दिखाने के लिए करते हैं जब शरीर में जवानी की उमंग होती हैं और मौका हाथ लगने पर भगवान से भी भिड़ जाने की तरंग होती हैं)। उस दौर में जब सुपरहिट फिल्म दीवार, सिनेमाई अंदाज में अमिताभ बच्चन की भगवान से बगावत को जायज ठहरा रही थी; बौड़म भैया की गुरु से बग़ावत कोई बड़ी बात नहीं थी। बौड़म भैया ने सोचा पढ़ना हैं तो 'विश्व का इतिहास' पढ़ा जाये, सिर्फ भारत का इतिहास पढ़कर अपने को विश्व के इतिहास से विरत रखना, स्वयं को 'कुँए का मेढ़क' बनाना हैं। मेंढक का स्वरुप याद करते ही उनका मन, मन-ही-मन लसलसा गया। इसे नीति विरुंद्ध जानकार, अपनी समझ को गुरूजी की समझ के ऊपर समझकर उन्होंने 'विश्व इतिहास' विषय का चुनाव किया।
पर जिस तरह पुराने ज़माने में लोग अपना सोना-चांदी ज़मीन में दबा के भूल जाते थे और बाद किसी भाग्यवान के खेत में खजाना मिलने पर, "खेत और खेत का मालिक" नजदीकी पुलिस थाने, पुरातत्व विभाग और गांव के लोगों के लिए खोज और चर्चा का विषय बन जाते हैं। ठीक उसी तरह से, समय बीतने के साथ 'विश्व इतिहास' का विषय के रूप में चुनाव, बौड़म भैया के सीने में राज की तरह दफ़न हो गया।
आप ये सोचियेगा कि बौड़म भैया के घर वाले इन बातो से अनजान कैसे रह गये। तो आप की जानकारी के लिए बता दूँ कि ये वो जमाना था जब बच्चे लतियाने के बाद विद्यालय भेजे जाते थे और विद्यालय से लौटने पर भी अक्सर ऐसे ही सम्मानित होते थे। ऐसा नहीं था कि बच्चे को लाड प्यार से स्कूल बस तक छोड़ने के लिए घर में किसी की जिम्मेदारी तय होती थी। पाठ्यक्रम में लिखित तौर पर Extra-Curricular क्रियाकलाप का कोई जिक्र नही होता था लेकिन विद्यालय में एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पेड़ पर चढ़ने, तालाब में तैरने, आम तोड़ने और गिल्ली डंडा खेलने की व्यावहारिक शिक्षा दे दी जाती थी। न तो इंटरनेट था और न ही स्मार्ट फ़ोन। तो इन्ही कारणों से, विषय के चुनाव की जानकारी तब तक किसी की जानकारी में नहीं आयी जब तक इम्तिहान का दिन नहीं आ गया।
इम्तिहान के दिन भी सभी विद्यार्थी अपनी जगह पर बैठ गए थे, प्रश्न पत्र बांटा जा चूका था। लिखना शुरू करने की घंटी अभी बजी नहीं थी। मुन्ना सिंह अपनी जगह पर खड़े हो कर गुरूजी से उलझ गए- गुरूजी पेपर सिलेबस के बाहर हैं। गुरूजी ने कान उमेठ कर समझाया जब साल भर कक्षा के बाहर रहोगे तो पेपर तो बाहर का ही लगेगा ना- बैठ जाओ चुप-चाप।
मुन्ना सिंह पुरे आत्म विश्वास से चित्रा गाइड से पुरे आठ प्रश्न पढ़ कर आये थे। थोड़ी देर सकते में आ गए कि गलत गाइड तो नहीं पढ़ लिये। लगे बौड़म भैया को कोहनियाने - गुरु अपना धड़ाधड़ लिखे जा रहे हो, हमको सब गलत प्रश्न रटवा दिये।
बौड़म भैया दोस्ती पर लांछन बर्दाश्त नही कर पाये। मुन्ना सिंह का पेपर देखने लगे और उत्तेजना में चिल्ला पड़े- गुरूजी सही में, मुन्ना के पेपर में अल्लाउदीन खिलीजी की जगह नेपोलियन के सैन्य संगठन के बारे पूछ लिया हैं !
गुरूजी दौड़ पड़े, हल्ला मच गया। परीक्षा कक्ष में प्रिंसिपल साहेब बोले- अरे सब पर्चा तो बोर्ड ऑफिस से आया हैं, एक पर्चा अलग कैसे निकल गया। गुरूजी मिमियाए - उ का हैं कि राम किशुनवा बोले रहा की एक लिफाफा अलग हैं लेकिन हम जल्दी में देखे नहीं। आनन-फानन में सारे कागजात निकले गए। ई पर्चा तो गिरिजा शंकर का हैं- गुरूजी कसमसाये- ई बौड़म जँहा रहेगा बवाल काटता रहेगा।
परीक्षा कक्ष में नजारा बदल चुका था। मुन्ना सिंह रटे हुए उत्तर परीक्षा की कॉपी पर उलटते जा रहे थे। बौड़म भैया ने प्रश्न पत्र से उठते बवंडर पर एक नजर मारी। वैसे तो हर परीक्षा एक विप्पति होती हैं, पर इस विपत्ति का ओर छोर नज़र नहीं आता था। गुरूजी सहानभूति आँखों में भर के बौड़म को निहार रहे थे। नज़ारे मिली, नज़र नज़र में प्रश्न हुआ-- कुछ बताएँगे! गुरूजी ने नज़रें झुका ली।
पर वाह रे वीर, हार नहीं मानूँगा- रार नहीं ठानूँगा की तर्ज पर कमर कस के भैया ने एकलव्य की भांति चित्रा गाइड पर बनी माता सरस्वती के चित्र का ध्यान लगाया और शुरू हो गए और तीन घंटो तक बहादुर सैनिक की तरह सभी प्रश्न रूपी दुश्मनो का डट के सामना किया।
बोर्ड ऑफिस से खबर पक्की हो चुकी थी कि पुरे उत्तर प्रदेश में विश्व इतिहास का पर्चा एक विदयार्थी के लिए छपा हैं। अघोषित तौर पर बौड़म भैया को फेल करार दिया जा चूका था। पर रिजल्ट के दिन चारो ओर बौड़म भैया छाये हुए थे। बौड़म भैया ने अच्छे नम्बरो से पास होकर परीक्षा-परिणाम के बड़े बड़े पंडितो की बोली बंद कर दी थी।
एक दिन छैला बिहारी ने भैया की चुटकी लेनी चाही - भैया आज का दौर होता तो आप किसी टीवी चैनल के प्राइम टाइम पर नजर आते, ट्विटर पर धमाका हो गया होता। लेकिन भैया एक डर भी रहता- बिहार के टॉपरों की तरह मामला गड़बड़ा भी सकता था।
भैया ने मामले की गंभीरता को समझा और पार्टी प्रवक्ता की तरह समझाया - छैला, तुम अकबर की सेना में रहे हो?
'नही'
नेपोलियन की ???
'नहीं'
अबे तो अकबर का सैन्य संगठन नेपोलियन के नाम से बता देंगे तो हमारी बात काट दोगे क्या?? ठीक तुम्हारी तरह कोई मास्टर भी हमारे जवाब नहीं काट पाया।
और ये बताओ अभी पप्पू पानवाले की दुकान के सामने, सायकिल वाले को कौनो ठोंक दिया था। जानते हो कि नहीं !! अब सुबह के अख़बार उठा लो, 'आज' पेपर वाले कहते है कि मोटरसाइकिल ने ठोंका हैं, 'दैनिक जागरण' वाले बोलते हैं कि पिंटूवा ने पटका हैं।
भैया पान की पीक लीलते हुए गरमा गए----अब एक दिन पुरानी बात पर दुनिया में एक राय नहीं हैं तो चार सौ साल पुरानी बात उठाकर, कौन ससुरा हमारी डिग्री पे प्रश्नचिन्ह लगाएगा।
छैला पुराने आदमी थे, उनको तत्काल महाकवि घाघ की याद आ गयी:
"घाघ कहे सुन घाघनी, इसी गांव का रहना,
ऊंट बिल्लैया ले गयी, बस हाँजी हाँजी कहना"
जब गांव का बड़ा बागड़-बिल्ला कह रहा है कि ऊंट को बिल्ली उठा ले गयी है, तो पानी में रहकर मगरमच्छ से बैर लेने का कोई फायदा नहीं। बस बोलते रहो की हाँ गुरु, हम देखे थे जब बिल्ली ऊंट को उठा के ले जा रही थी !!
छैला बिहारी ने अपनी सहमति दर्ज करायी "जय हो गुरुदेव"
बैठक जमने में देरी थी, धुंधलका छा रहा था। छैला गुनगुना रहा था।
कथानक जारी।।।।।।।।।।।
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