"मन मार के जियो" अध्याय 2
जीवन में एक नये सिद्धांत का अवतरण हुआ। "मन मार के जियो " लगता था कि ज्यादा कुछ नहीं तो थोडा बहुत ही सही उपनिषद वेत्ता बनने की ओर अग्रसर हुए । हम गुनगुनाते हुए बढ़े जा रहे थे। लल्लन दद्दा ने पूछ लिया बबुवा क्या बात हैं ? चेहरा देख के लगता हैं कि "तुम्हे ख़ुशी मिली इतनी कि मन में ना समाय"
लल्लन दद्दा वैसे तो दद्दा कहे जाते हैं लेकिन उम्र में चच्चा के आस पास बैठते होंगे। दद्दा पीढ़ियों से चली आ रही पारिवारिक परम्परा में सबसे बड़के परिवार के कर्ता धर्ता थे। गांव वालो की कहानियों को सच माना जाये और mythology मान के सिरे से ख़ारिज न किया जाये तो दद्दा के दद्दा ने अपने ज़माने में जमींदार को मठ्ठा पिला के कई बिगहे जमीन हथिया ली थी और गांव के सबसे बड़े काश्तकार बन गए थे। दद्दा ने गांव को ही अपनी कर्मभूमि बनाया। सुनते थे कि उनकी अच्छी नौकरी मुम्बई (तब बम्बई ) के गोदरेज़ में लगी थी। लेकिन दद्दा को अपनी आज़ादी से बहुत प्रेम था जिसे वो हरगिज़ मिटाने को तैयार नहीं थे। उनकी आज़ादी पर जब बड़ा प्रहार सुपरवाइजर ने किया और उनकी समय समय पर सुर्ती मलने की आदत पर ऊँगली उठाई। दद्दा ने जमी जमाई नौकरी को छोड़कर ग्राम भूमि को कर्मभूमि बनाने का संकल्प लिया और वापस आ गए। गोदरेज की चिट्ठी पे चिट्ठी आती जिसमे दद्दा से वापस आ जाने या अपना हिसाब करने का निवेदन होता। हर चिट्ठी के आगमन के साथ दद्दा का कद ऊँचा होता जाता। आस पास के क्षेत्र में दद्दा आदर और विस्मय की वस्तु थे, जँहा लोग चपरासी बनने के लिए पैसे हाथ में लिए दफ्तरों के आगे ऐड़िया रगड़ते थे, दद्दा को कई साल बाद कंपनी ने खुद पूछा कि जवाब नहीं आने पर मान लिया जायेगा कि आप संसार त्याग चुके हैं।
ऐसे ऐतिहासिक और महान दद्दा ने पूछा तो हमने उन्हें जीवन रहस्य से अवगत कराया। दद्दा उखड गए- अबे घोंचू, जिस आदमी ने अपनी ज़िन्दगी मौज़ में गुजार दी, उसको तुम रहस्य बताते हो कि मन मार के जियो। अबे दिल खोल के जियो। मन मार के जीना भी कोई जीना हैं। अरे बेटा, इस दुनिया में जीना हैं तो सुन लो मेरी (उर्फ़ हेलन, गुमनाम सिनेमा वाली) बात, दिल खोल के मनाओ रंगरेली।
सिद्धान्त को पैदा हुए एक घंटे भी नहीं हुए थे और झटका लग गया। हमने दद्दा को बताया दद्दा, छैला बिहारी से चर्चा के बाद हमने भी यही सोचा था। लेकिन पिंटुवा ने दरेर के हमे बाबा के ज्ञान सूत्र को मांनने पर मजबूर कर दिया।
दद्दा से समझाया अरे बांगड़ू अगर कोई एक फार्मूला इस ज़िन्दगी को समझा और सुलझा सकता तो इतने ढेर सारे धर्म ग्रन्थ, उनपे ढेर सारी टीकाएं और हज़ारो हज़ार जीवन सूत्र होते। हर आदमी जिन परिस्थितियों में जिंदगी जीता हैं, उन्ही से प्रभावित होकर अपना जीवन सूत्र बना लेता हैं। अब बाबा तो खाना बनाने की गैस खत्म हो जाये तो आटे को पानी में घोल के पी लेगा और सो जायेगा। तो ऐसे आदमी का सूत्र तो "मन मार के जियो" ही होगा। दूसरी ओर छैला हैं जिसने जिंदगी चार्वाक के सिद्धान्त पर गुजारी है: "ऋण कृत्वा घृतं पिवेत, यावत जित्वा तावत पिवेत"
दद्दा की दार्शनिक मुद्रा गहराती जा रही थी। सुर्ती रगडाते हुए रंग छोड़ने लगी थी। दद्दा बोले कल अगर पिंटूवा की जगह बनवारी की भैंस टकराई होती तो सिद्धान्त बदल जाता न !!
दद्दा की बात में दम था। दद्दा ने confidence पर हमला कर दिया था। सिद्धान्तों के पंख दिखाई तो नहीं पड़े पर लगा की अधर में छोड़ के उड़ चुके हैं। अब क्या करे, क्या नाम दे, कैसे उन्हें हम पुकारे। नवजात सिंद्धान्त की हत्या की जा चुकी थी।
इस दीनहीन दशा में बड़की भउजी मंदिर जाती दिख पड़ी। हम दद्दा की चरण रज लेते हुए भौजी की ओर बढ़ चले।
ऐसे ऐतिहासिक और महान दद्दा ने पूछा तो हमने उन्हें जीवन रहस्य से अवगत कराया। दद्दा उखड गए- अबे घोंचू, जिस आदमी ने अपनी ज़िन्दगी मौज़ में गुजार दी, उसको तुम रहस्य बताते हो कि मन मार के जियो। अबे दिल खोल के जियो। मन मार के जीना भी कोई जीना हैं। अरे बेटा, इस दुनिया में जीना हैं तो सुन लो मेरी (उर्फ़ हेलन, गुमनाम सिनेमा वाली) बात, दिल खोल के मनाओ रंगरेली।
सिद्धान्त को पैदा हुए एक घंटे भी नहीं हुए थे और झटका लग गया। हमने दद्दा को बताया दद्दा, छैला बिहारी से चर्चा के बाद हमने भी यही सोचा था। लेकिन पिंटुवा ने दरेर के हमे बाबा के ज्ञान सूत्र को मांनने पर मजबूर कर दिया।
दद्दा से समझाया अरे बांगड़ू अगर कोई एक फार्मूला इस ज़िन्दगी को समझा और सुलझा सकता तो इतने ढेर सारे धर्म ग्रन्थ, उनपे ढेर सारी टीकाएं और हज़ारो हज़ार जीवन सूत्र होते। हर आदमी जिन परिस्थितियों में जिंदगी जीता हैं, उन्ही से प्रभावित होकर अपना जीवन सूत्र बना लेता हैं। अब बाबा तो खाना बनाने की गैस खत्म हो जाये तो आटे को पानी में घोल के पी लेगा और सो जायेगा। तो ऐसे आदमी का सूत्र तो "मन मार के जियो" ही होगा। दूसरी ओर छैला हैं जिसने जिंदगी चार्वाक के सिद्धान्त पर गुजारी है: "ऋण कृत्वा घृतं पिवेत, यावत जित्वा तावत पिवेत"
दद्दा की दार्शनिक मुद्रा गहराती जा रही थी। सुर्ती रगडाते हुए रंग छोड़ने लगी थी। दद्दा बोले कल अगर पिंटूवा की जगह बनवारी की भैंस टकराई होती तो सिद्धान्त बदल जाता न !!
दद्दा की बात में दम था। दद्दा ने confidence पर हमला कर दिया था। सिद्धान्तों के पंख दिखाई तो नहीं पड़े पर लगा की अधर में छोड़ के उड़ चुके हैं। अब क्या करे, क्या नाम दे, कैसे उन्हें हम पुकारे। नवजात सिंद्धान्त की हत्या की जा चुकी थी।
इस दीनहीन दशा में बड़की भउजी मंदिर जाती दिख पड़ी। हम दद्दा की चरण रज लेते हुए भौजी की ओर बढ़ चले।
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