स्वर्गिक अनुभूति: शांतिवन, माउन्ट आबू

आज मैं शांतिवन में हूँ। यह शांतिवन माउंट आबू में स्थित है। आबू रोड रेलवे स्टेशन से 7 किलोमीटर की दूरी पर यह शांतिवन प्रजापिता ईश्वरीय विश्वविद्यालय के नाम से संचालित होने वाली संस्था है। इसे ब्रह्मा बाबा ने स्थापित किया था।

मनुष्य के मन में सदैव से स्वर्ग और नरक की अलग-अलग व्याख्या रही है। सदैव मानव मन स्वर्ग और नरक को परिभाषित करता रहा है। स्वर्ग को अनेक प्रकार से परिभाषित किया गया है। परंतु वह एक बात जो मुझे अपने 1 दिन के यहां के प्रवास में समझ में आई, वह यह है कि यदि स्वर्ग जैसी कोई व्यवस्था कहीं विकसित होती है तो वह ऐसी ही होगी। 

इस कथन के पीछे कुछ तो मेरे मन मे उत्पन्न श्रद्धा और विश्वास है। परंतु उससे अधिक कई अन्य निरपेक्ष कारण भी है। श्रद्धा और विश्वास कहीं हो जाए तो वह स्थान वैसे ही स्वर्ग हो जाता है। इसलिए श्रद्धा और विश्वास पर चर्चा करने की आवश्यकता नहीं है। जहां तक अन्य कारण हैं, उनको मैं बिंदुवार इस प्रकार से समझ पाता हूं:---

1. अद्वितीय स्वर्गिक वास्तु कला: वास्तुकला और स्थापन इस प्रांगण की हर इमारत को मनुष्य की स्वर्गिक कल्पना से जोड़ता है। हर इमारत मनुष्य की कल्पना में उकेरे गए स्वर्ग की छवि को दृश्यात्मक सत्यता प्रदान करती है।

2. इमारतों के रंग और कमरों का विन्यास: शांति के प्रतीक सफेद रंग का प्रयोग इमारतों और कमरों को शांति में भव्यता प्रदान करता है। इमारत के कमरों में बाबा की दिव्य छवि, लाल प्रकाश का संयोजन कमरों को आध्यात्मिक चेतना से लबरेज कर देता है।

3. स्वचालित अत्याधुनिक टाऊनशिप व्यवस्था:- पूरा शांतिवन एक टाउनशिप के समान है। एक टाउनशिप में जो जो चीजें आवश्यक होती हैं वह सब कुछ यहां पर है। टाउनशिप के नियमित वासियों के लिए अलग रहने की व्यवस्था, बाहर से आने वालों के लिए अलग व्यवस्था, समर्पित कार्यकर्ताओं के लिए अलग व्यवस्था। इन सभी लोगों के एकत्र होने पर उनके भोजन, शयन व ध्यान की व्यवस्था। सभी के एक साथ बैठने के लिए अद्भुत विस्तृत हॉल। वास्तु कला भवन, अन्नागार, भोजनालय,  फायर डिपार्टमेंट इत्यादि अपनी संपूर्णता में उपलब्ध है।

4. सूक्ष्म अज्ञात सा प्रबंधन तंत्र:- बाहर से आकर मैंने समझने का प्रयास किया तो लगा कि एक सूक्ष्म प्रबंधन तंत्र हर जगह मौजूद है। परंतु उसकी मौजूदगी सिर्फ समर्पित कार्यकर्ता पता कर पाते है। बाहर से आने वालो के लिए यह एक पूर्ण रूपेण स्वचालित व्यवस्था है। 

5. सहज सेवा भाव:- शांतिवन में उपस्थित लोगों में एक समान भाव हर जगह महसूस किया जा सकता है। वह है सेवा भाव। सेवा की सहज वृत्ति मौजूद है।

6. स्वच्छता:- किसी भी घर की स्वच्छता का अंदाजा लगाना हो तो वहां के ड्राइंग रूम की अपेक्षा बाथरूम और रसोईघर का रुख करना चाहिए । मुझे अभी तक के यहां के रसोईघर को अंदर से देखने का सौभाग्य नहीं मिल पाया। परंतु बाहर से जो झलक मिली है उससे मैं यह निश्चित तौर पर कह सकता हूं कि उच्च कोटि की स्वच्छता के नियमों का अनुपालन यहां किया जा रहा है। इसके अतिरिक्त इतने सारे भवन इतनी सारी गतिविधियां, इतने सारे लोगों के साथ नियमित रूप से संचालित हो रही हैं परंतु मुझे कहीं भी गंदगी का लेश मात्र भी नहीं दिखाई पड़ा। पूरे क्षेत्र में, पूरी टाउनशिप में मुझे एक भी इमारत ऐसी नहीं मिली जिस पर कराए गए रंग खराब हुए हो या उन पर काई जमी हो या वह उन पर किसी भी प्रकार की कोई गंदगी हो। कचड़े का अभूतपूर्व प्रबंधन है। सरकार को माडल टाऊनशिप विकसित करते समय, इस संस्थान से विमर्श करना ही चाहिए।

7. आत्मानुशासन:- अनुशासन की पराकाष्ठा यह दिखाई पड़ती है। मैंने कॉन्फ्रेंस हॉल में ध्यान योग में शिरकत की। पूरे हॉल में लगभग 1000 से 3000 लोगों के बैठने की व्यवस्था होगी। हॉल में लगभग सभी कुर्सियां भरी थी। सभी लोग बैठे थे। मैंने लगभग ढाई घंटे ध्यान योग किया। ध्यान के समय चलने वाले संगीत के अतिरिक्त किसी अन्य व्यक्ति की कोई भी आवाज मेरे कानों तक नहीं आई। लोग पूरी शांति के साथ आये, बैठे और ध्यान करके आते जाते रहे परन्तु हॉल की शांति अक्षुण्ण रही। मुझे लगता है कि प्रबंधन इस बात का भी ध्यान देता है कि दरवाजे खुलने बंद होने पर भी जरा सी भी आवाज़ न हो।

8. कोई पुलिस व्यवस्था नहीं:- जिस क्षेत्र में देश के विभिन्न ने प्रांतों से अलग-अलग तरह के लोग इकट्ठा हो रहे हो। जिनका सम्मिलित विभिन्न प्रकार का कार्यक्रम चल रहा हो। परंतु इन सभी को नियमित करने के लिए इस शांतिवन में किसी पुलिस बल या व्यवस्था की आवश्यकता ही नहीं नजर आई। यह अपने आप में सबसे बड़ी विशेषता है जिसके आधार पर निश्चयआत्मक रूप से इस व्यवस्था को स्वर्गिक व्यवस्था कहा जा सकता है।

इन सभी आधारों पर मैं कह सकता हूं कि मानव की कल्पना में जिस स्वर्ग की रचना होती है। वह स्वर्ग ऐसा ही होगा जैसा यह शांतिवन है।

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प्रियदर्शी प्रतीक
19.08.2022
शांतिवन, माउंट आबू

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