तीसरा पहर रात का

नींद टूटी
रात के तीसरे पहर में
मन की चादर पर
उसीकी सिलवटें है
याद का तकिया
सिसकता सा पड़ा है
उलझनों का पंखा
घररघर चल रहा है
बातों का गद्दा है
जिसपर मैं पड़ा हूँ
कसमसाकर बात ऐसी कह रहा है
भूल जा उसको
वो तुझको छल गया है।

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प्रियदर्शी प्रतीक

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