हाक़िम
रखें है सर जरा ऊँचा, वो लंबी नाक रखे है।
निकलते जब भी वो बाहर, सिजदे की आस रखे है।।
पेशकार औ सिरस्तेदार, खास इनके है ताबेदार।
प्रशासन में दबाकर, मुग़लिया इतिहास रखे है।।
है हाकिम ये कचहरी के, शक्ति ओहदे में रखे है।
कानूनों के विवेचन का, लंबा इतिहास रखे है।।
न डरते है किसी से, ना किसी को कुछ समझते है।
सम्मन, वारन्ट, कुर्की डिक्री सम ब्रम्हास्त्र रखे है।।
है फीके रंग, फीका ढंग, दिखे फीकी तबियत के।
छिपाकर फ़िके रंगों में, रंगीं मिज़ाज़ रखे है।।
दीपक तले होता अंधेरा, इस कहावत को।
अपनी हरकतों औ ढंग से, कर चरितार्थ रखे है।।
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प्रियदर्शी प्रतीक
(हर विधा की, हर कार्य की जैसे एक पहचान होती है। वैसे ही उस कार्य को करने वाले की भी एक पहचान होती है। कचहरी व हाकिम को नजदीक से देखने वाले लोगों के विचारों को शब्द देने का एक प्रयास किया है।)
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