एक पाती, पिंजड़े से : कोरोना वायरस लॉक-डाउन
एक विषाणु ने मानव समाज की गति का पहिया थाम लिया है। बहुआयामी चुनौती आज समाज के सामने खड़ी है। हर तरफ अस्थिरता और भय का वातावरण व्याप्त है। मनुष्यता की परीक्षा की घड़ी है और मनुष्य घुटनों पर आ चुका है।मानव निर्मित समाज की चूलें हिल रही है।
ऐसे में कुछ ऐसी तस्वीरें और बातें ध्यान आकर्षित करती है जिनमें वातावरण में प्रदूषण की कमी और जीव-जंतुओं की अठखेलियाँ दर्शायी गयी है। अपने आस-पास, रंग-बिरंगी तितलियाँ जब बालकनी के सामने उड़ रही है, पक्षी कलरव कर रहे है, तो बहुत दिनों बाद इनको देखकर, प्रश्न उठ रहे है कि:-----
क्या आँखे इन्हें देखना भूल गयी थी?
क्या भौतिकतावादी वातावरण में तितलियों का होना या ना होना हमें प्रभावित नही कर रहा था?
अथवा ये अब स्वयं को सुरक्षित जान कर, परमेश्वर की बनायी सृष्टि में, ये यह जताने के लिये निकली है कि ईश्वर की सर्वार्थ सक्षम रचना होने का हमने दुरुपयोग किया है; ईश्वर की अन्य रचनाओं के जीवन व परिवेश में अनुचित दखल देने पर वह दिन भी आ सकता है जब मनुष्य को भी पिंजड़े में बंद होना पड़ेगा।
तो क्या यह ईश्वरीय इच्छा का प्रतिबिंब है!!!!
फिलवक्त Covid-19 की उत्पत्ति व प्रसार स्वयं में एक पहेली है। यह बिल्कुल भी हो सकता है कि कोरोना नामक विषाणु मानव जनित हो और मानवीय भूल अथवा साज़िश परिणाम हो।
फिर भी, यदि कर्मफल के सिद्धांत का अनुशीलन करे तो यह कहना गलत नही होगा कि यह विधाता का न्याय दंड ही है कि प्रकृति के समस्त पादप और जन्तुओं को पिंजड़े में बंद करके तमाशा देखने का दर्प रखने वाला, आज स्वयं पिंजड़े में बंद होने को मजबूर है, दर्प चकनाचूर है।
परंतु यह भी सत्य है कि मनुष्य ने कभी हार नही मानी है और हर मुश्किल को पार करके और मजबूत बनकर उभरा है। उम्मीद की किरण दिख भले ही नही रही है पर उम्मीद है कि क्षितिज के उस पार इस संकट से निकलने का कोई द्वार अवश्य होगा। हम और विश्वासी और शक्तिशाली बन कर इस समस्या से बाहर आयेंगे।
परन्तु मनुष्य की विवशता में, प्रकृति का हास, कहीं न कहीं इस बात का द्योतक है कि मनुष्य ने प्रकृति की सहनशीलता की मर्यादा पर कर ली है। उम्मीद है कि जब विनाश के उस पार विकास के रास्ते तलाशें जाएंगे तो "समावेशी विकास" की अवधारणा में "समावेशी प्राकृतिक विकास" संदर्भित होगा।
नया सबेरा आयेगा।
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प्रियदर्शी प्रतीक
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