समाज, अध्यापन व धर्म: संस्कृत विद्या धर्म संकाय में मुस्लिम शिक्षक की नियुक्ति

डॉ फिरोज़ खान, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय के साहित्य विभाग में नियुक्त हुए हैं। इस नियुक्ति का विरोध भी हो रहा है और समर्थन भी हो रहा है। संस्कृत के मुसलमान छात्र की "वेद के छन्द शास्त्र" के प्राध्यापक के रूप में नियुक्ति की स्वीकार्यता नही दिखाई पड़ रही है। विरोध स्वरूप कुछ छात्रों का कुलपति के आवास पर धरने का क्रम जारी है। ऐसे में विरोध में मुखरित स्वरों के फेसबुक पोस्ट में उनके विचारों पर गौर करने पर ये तर्क समझ मे आते है:--

1. विरोध को समझने के लिये संकाय की संरचना को समझने की भी जरूरत है। 'संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय' यह पूरा नाम है, जिसमें दो हिस्से हैं। पहला 'संस्कृत विद्या' और दूसरा 'धर्म विज्ञान' (Theology)। समझने की बात यह है कि 'संस्कृत विद्या' कोई भी किसी भी धर्म का व्यक्ति पढ़-पढा सकता है। लेकिन 'धर्म विज्ञान' की बात जब कोई दूसरे धर्म का व्यक्ति करे तो विश्वसनीयता नहीं रह जाती। इसी कारण से यह संकाय भारत के अन्य संस्कृत संकायों/विभागों से भिन्न है। 'हिन्दू' विश्वविद्यालय में मालवीय जी ने इस संकाय की स्थापना संस्कृत विद्या के संरक्षण-संवर्धन के लिये इस उद्देश्य से किया कि हिन्दुओं की धार्मिक मान्यताओं के वैज्ञानिक स्वरूप की व्याख्या की जा सके। जब किसी हिन्दू धार्मिक मान्यता को (इस्लामिक और इसाई संगठनों द्वारा पोषित) बुद्धिजीवी दकियानुसी कह कर मजाक उड़ाते हैं तब इस संकाय की जिम्मेदारी होती है कि ये उस धार्मिक मान्यता का वैज्ञानिक पक्ष सबके सामने रखे। संकाय के मंदिरनुमा भवन के प्रवेश द्वार पर दो स्तंभों पर शंकर पार्वती की मूर्तियां स्थापित हैं जिनका अधिकाशं प्रोफेसर्स प्रदक्षिणा करते हुए संकाय में प्रवेश करते हैं। इस संकाय से प्रकाशित होने वाला 'विश्व हिंदू पंचांग' पूरे विश्व के हिन्दू धर्म के तिथि त्योहार सम्बन्धी विवादों का समाधान करता है। दुर्भाग्य यह है कि इसके बारे में हिन्दू विश्वविद्यालय के लोग ही नहीं जानते। आशंका यह है कि आज से 20 साल बाद जब गैर हिन्दू लोग संकाय-प्रमुख और विभागाध्यक्ष होंगे तब हिन्दू-परम्पराओं की न जाने क्या-क्या व्याख्याएं की जाएंगी।*

2. यह विरोध एक गैर-हिन्दू का 'धर्म-विज्ञान संकाय' में नियुक्ति का विरोध है। अगर यह नियुक्ति विश्वविद्यालय के ही किसी अन्य संकाय में संस्कृत अध्यापक के रूप में होती तो विरोध नहीं होता। विरोध का मूल इस विशेष संकाय में गैर-हिन्दू की नियुक्ति में निहित है। विरोध करने वाले छात्र परम्परावादी हिन्दू हैं जो भविष्य को लेकर सशंकित हैं। उनकी आशंका है कि 15 साल बाद संकाय में एक मुसलमान प्रोफेसर होगा, विभागाध्यक्ष होगा, डीन होगा। कइयों की नियुक्ति करेगा, और एक दौर आयेगा जब हिन्दू विश्वविद्यालय के हिन्दू धर्म संकाय का संचालन गैर-हिन्दू करेंगे। और इस संस्था की स्थापना का मूल उद्देश्य छिन्न भिन्न हो जायेगा।*

इन विरोध के अवयवों पर गौर करे तो ऐसा प्रतीत होने लगता है कि एक गहरी साजिश के तहत इस प्रकार की नियुक्ति की गयी जो भविष्य में धर्म विज्ञान संकाय के पतन का कारक होगी।

परन्तु क्या सच यही है!!!!

क्या हम यह समझते है कि धर्म विज्ञान संकाय में पढ़ने वाले कच्ची उम्र के अबोध बालक-बालिका होते है जिनके पास स्वयं का विवेक व शास्त्र ज्ञान उचित मात्रा में नहीं होता है!!! क्या विधर्मी शिक्षक उन्हें भ्रमित करके धर्म की अवहेलना सीखा सकता है!!!

क्या हमारे धर्म शास्त्र और ग्रंथ इतने संपुष्ट और ओजपूर्ण नही है कि उनका अध्ययन करने वाले का हृदय परिवर्तन कर सकें!!!

क्या अन्य धर्म इतने सशक्त है कि उनको मानने वाला कभी भी हिन्दू चेतना की ओर आकर्षित हो ही नही सकता है!!!

क्या संस्कृत, जिसे देव भाषा का दर्जा हम देते है, का विद्यार्थी जिसने उन ग्रंथों व शास्त्रों का अध्ययन किया है, जिसे आम हिन्दू जन ने पढ़ना तो दूर की बात देखा तक नही होगा, जिन्हें पढ़ने मात्र से सनातन धर्मावलंबी विद्वता क्या, मुक्ति की बात करते है, उन शास्त्रों के अध्धयन के बाद भी कुछ भी कलुषित मन में बच सकता है!!!

विरोध में दिए गए तर्क कुछ स्तरों तक श्री राजीव महरोत्रा द्वारा श्रृंगेरी शारदा पीठ की अध्धयन पीठ अमेरिकन विश्वविद्यालय में स्थापित होने के विरोध में, उनकी पुस्तक The Battle For Sanskrit में दिए गए तर्कों से, साम्य स्थापित करते है। लेकिन साथ ही यह भी प्रदर्शित करते है कि "वेद का छन्द शास्त्र" पढ़ाने के लिये नियुक्त हुए मुस्लिम युवक, जिसने राष्ट्रीय संस्कृत शिक्षा संस्थान, जयपुर से संस्कृत में एमए एवं पीचडी की उपाधि हासिल की है, की नियुक्ति का विरोध करके हम वही खड़े दिखाई पड़ते है जहाँ यह साफ परिलक्षित होता है कि हम कितना भी सुधारवादी दिखने की चेष्टा कर ले किंतु अभी भी अपनी रूढ़ धारणाओं से इस प्रकार बंधे है कि किसी विधर्मी को अपने समाज मे समायोजित नही कर सकते।

कथा प्रसिद्ध है कि पण्डितराज जगन्नाथ शाहजहाँ की पुत्री लवंगी से विवाह करके दिल्ली से बनारस आये और विद्वत्-सभा में जाने की कोशिश की तब उन्हें 'यवनीसंसर्गदूषित' कहकर संस्कृत-विद्या के अपय्य दीक्षित जैसे दृढ़ धार्मिक आचार्योंं ने बहिष्कार किया, और उनकी सारी विद्वत्ता प्रतिपादित करते रहने के बावजूद नहीं अपनाया। बाद में पण्डितराज जग्गनाथ ने माँ गंगा का आह्वान करके जल समाधि ले ली।

संविधान, शास्त्र और धार्मिक चेतना के आलोक में यह निर्धारित करना पड़ेगा कि तब जो हुआ वह सही था या नहीं, अब जो हो रहा है वो सही है या नही। काशी की धरती,आदि शंकराचार्य व मंडन मिश्र के शास्त्रार्थ और मंडन मिश्र की पत्नी उदया भारती सरीखी निर्णायक की साक्षी रही है।काशी शास्त्रार्थ का केंद्र रहा है। परस्पर विरोधी विचार, तर्क होना ही इस बात की अभिव्यक्ति है कि मौलिकता फल फूल रही है। शास्त्रार्थ की आवश्यकता है, मंथन की आवश्यकता है। क्योंकि इस मसलें का हल न सिर्फ वर्तमान समाज की स्तिथि को प्रतिबिंबित करेगा अपितु भविष्य की दिशा व दशा का निर्धारक होगा।

-----
प्रियदर्शी प्रतीक

* फेसबुक पर श्री सौरभ द्विवेदी की पोस्ट (https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=2377458525698446&id=100003029641419) से

Comments

Popular posts from this blog

भीड़ चीखती और भीड़ चिल्लाती जाती

Budhha: Some thoughts on his Sculpture at Sanchi

Ecstasy of Blissfulness: Sadhguru