एनपीए नियंत्रण एवं बैंकों की लाभप्रदता

बैंकिंग व्यवसाय खतरों से भरा है। ऋण व्यवसाय के अपने खतरे है, सबसे बड़ा खतरा ऋण वापसी ना होना है। बैंकों की लाभप्रदता बहुत हद तक ऋण वसूली पर निर्भर करती है क्योंकि वसूला गया धन ही वापस मुख्यधारा में आकर नए ऋण के रूप में लौटता है। तत्पर एवं उचित वसूली प्रक्रिया ना केवल लाभप्रदता को बढ़ाती है बल्कि अर्थ व्यवस्था को सुचारु रखने में भी मदद करती है।

एनपीए की संकल्पना क्या है और क्यों आई इसको समझने के लिए हमें 1991 की ओर चलना पड़ेगा जब तत्कालीन वित्त मंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने उदारीकरण की प्रक्रिया को अंतिम रूप देते हुए संसद में संबंधित बिल रखते समय विक्टर ह्यूगो कि एक प्रसिद्ध उक्ति कहीं। उन्होंने कहा "इस संसार में कोई ऐसी ताकत नहीं है जो उस विचार को रोक सके जिसका समय आ चुका है" और हमारे देश में उदारीकरण आ गया। उदारीकरण की अर्थव्यवस्था में बैंकिंग में आमूलचूल परिवर्तन हुए। एनपीए की संकल्पना जैसी हमें आज देखने को मिलती है वह 1993 में आई आर ए सी नॉर्म(IRAC Norms) के माध्यम से आई। इसके अंतर्गत 90 दिन से ज्यादा ब्याज या किश्तों के बकाया रहने या खाते के आउट ऑफ आर्डर रहने पर खाता एनपीए करार दिया जाने लगा।

यदि हम वर्तमान बैंकिंग प्रणाली में एनपीए नियंत्रण से संबंधित प्रावधानों की बात करें तो उन्हें मोटे मोटे तौर पर दो बागों में देखा जा सकता है पहला खाते की सेहत दूसरा खाते की मॉनिटरिंग और फॉलो अप के प्रावधान।

सबसे पहले खाते की सेहत को अच्छा बनाए रखने के संदर्भ में क्या क्या सावधानियां बरतनी चाहिए इनके बारे में देखते है, तो हम पाते हैं की प्रमुख तौर पर निम्नांकित प्रक्रिया खाते की सेहत को निर्धारित करती है:- पहली: खाताधारक और उसकी गतिविधियों का उचित मूल्यांकन; दूसरी: सैंक्शन से संबंधित फॉर्मेलिटी का अनुपालन प्री और पोस्ट सैंक्शन दोनों ; तीसरी: समय पर किस्त और ब्याज की अदायगी का ध्यान रखना; चौथी: खाते की अस्वस्थता के लक्षणों को भावना और पांचवी: किसी भी प्रकार की अनियमित अनियमितता दिखाई पड़ने पर उचित कदम उठाना।

यदि उपर्युक्त प्रक्रियाओं का सम्यक पालन किया जाता तो जिस तरीके से एनपीए खातों की संख्या बढ़ रही है उस तरीके से ना बढ़ रही होती। यह कहने का आधार है यदि एनपीए हुए खातों से वसूली की प्रक्रिया पर नजर दौड़ाएं, तो हम सामान्य तौर पर पाते हैं की खातों की सिक्योरिटी के तौर पर ऋण प्रदान करते समय स्थावर संपत्ति के बंधक के अतिरिक्त जंगम संपत्ति भी ली जाती है। जंगम संपत्ति का बंधक नहीं होता बल्कि आडमान हायपोथेकेशन होता है। एनपीए हुए खातों से हुई वसूली को नजर डालें तो हम पाएंगे जंगम संपत्ति के विक्रय से हुई वसूली नगण्य होती है। इसका अर्थ यही है या तो सैंक्शन से जुड़ी आवश्यक रीतियों का उचित अनुपालन नहीं हो रहा है या अस्वस्थता पहचानने में देरी हो रही है या फिर उचित कदम उठाने में देरी हो रही है।

खाते की सेहत बिगड़ने पर जो अपेक्षा वर्तमान बैंकिंग प्रणाली में की जाती है वह निम्न प्रकार से होती है पहली क्रिटिकल या ऑडियो राशि ओवर ड्यू राशि की वसूली के लिए ऋणी से बात व्यवहार दूसरी खाते की वास्तविक परिस्थिति के अनुसार उस पर होल्डिंग ऑन ऑपरेशन या रिस्ट्रक्चरिंग व रि-शेड्यूल करने का प्रयास करना। उसके बाद खाता निगरानी की अवस्था में आने पर अन्य तमाम उपाय बताए गए। जिससे खाते को एनपीए से बचाने के अंतिम उपाय करने पड़ते हैं। एनपीए होने के बाद की कहानी काफी लंबी है विलफुल डिफॉल्टर निर्धारित करना,नॉन कॉपरेटिव बकायेदार का निर्धारण, समायोजन सेटलमेंट और अंत में वसूली के लिए वाद लाना, सरफेसी एक्ट में कार्यवाही करना इत्यादि।

इतने सारे और इतने प्रकार के नियंत्रण के उपाय होने के बावजूद एनपीए जिस गति से हो रहा है उसके कारण जानने की कोशिश की जाए तो यह समझ में आता है कि या तो नियंत्रण के जो उपाय किए जा रहे हैं उनमें विशेष खामी है या नियंत्रण के उपाय उचित रीति से प्रयोग में नहीं लाया जा रहे है। दोनों ही स्थितियां भयावह हैं।

एक सोच की धारा यह भी कहती है कि एनपीए होने से रोकना अत्यंत आवश्यक है परंतु यह ध्यान में रखने की जरूरत है कि बैंकिंग कारोबार की विशेष स्थिति को देखते हुए एनपीए का होना किसी उत्पाद के आनुषंगिक उत्पाद सरीखा है। अतः एनपीए का नियंत्रण ध्यान में रखने के साथ-साथ उसके निस्तारण पर ध्यान देना अत्यंत आवश्यक है।

आजकल एनपीए के बारे में हो रही चर्चाओं में, बैंकिंग इंडस्ट्री में एनपीए को एक राक्षस के रूप में निरूपित किया जाता है। परंतु एनपीए की स्थिति दावानल की तरह है जो कितने भी उपाय किए जाने के बावजूद जब एक बार लगती है तो पारिस्थितिकी को परिवर्तित किए बिना नहीं मानती। अतः विकसित राष्ट्रों में दावानल को रोकने के साथ साथ उसे बुझाने के उपायों पर बराबर ध्यान दिया जाता है। इसी तरह एनपीए को भी हम समझ सकते हैं, एनपीए को न सिर्फ नियंत्रित करने का प्रयास करने की जरूरत है बल्कि एनपीए होने पर उसके निस्तारण हेतु प्रयास करना भी अत्यंत आवश्यक है। यदि एनपीए का नियंत्रण और निस्तारण सम्यक रूप से हो सके तो वह अपने आप में बैंकिंग लाभप्रदता में वृद्धि करने में सक्षम है। यह कहा जा सकता है:-
एनपीए नियंत्रण + एनपीए निस्तारण = लाभप्रदता

एनपीए को लेकर तमाम तरह की नीतियां बन चुकी कार्य किए जा रहे है, परंतु अभी जमीनी परिवर्तन होने में समय है। आवश्यकता है नीतियों को जमीनी आवष्यकताओं के हिसाब से दुरुस्त किया जाए। यहां पर आज के समय में एनपीए की भयावहता और उसके नियंत्रण की समस्या को देखते हुए दुष्यंत कुमार जी का एक कलाम उपयुक्त रहेगा:-

"पक गई हैं आदतें, बातों से सर होंगी नहीं;
कोई हंगामा करो, अब ऐसे गुजर होगी नहीं।।"

धन्यवाद
प्रियदर्शी प्रतीक

Comments

Popular posts from this blog

भीड़ चीखती और भीड़ चिल्लाती जाती

Budhha: Some thoughts on his Sculpture at Sanchi

Ecstasy of Blissfulness: Sadhguru