न्याय और न्यायालय की डगर
सुना करते थे कि न्याय के लिए लड़ना पड़ता है और न्याय की डगर बड़ी कठिन होती है। डुमराव अनुमंडलीय न्यायालय में पहुंचने पर पता चला कि सच में न्याय के साथ-साथ न्यायालय पहुंचने की डगर भी बड़ी कठिन होती है।
न्यायालय पहुंचने के रास्ते अत्यंत दुर्गम है। लेकिन ऐसा नहीं है यह मार्ग सिर्फ वादकारियों की परीक्षा लेता है। न्याय की स्थापना के लिए न्यायाधीशों के साथ-साथ न्यायालय के स्टाफ और अधिवक्ताओं को भी इस कठिन परीक्षा से होकर गुजरना पड़ता है। न्याय के शासन की स्थापना हेतु न्याय स्थल पर पहुंचने की यह परीक्षा प्रतिदिन देनी पड़ती है।
मुख्य रूप से तीन मार्ग हैं जो अनुमंडलीय न्यायालय तक पहुंचाते हैं। प्रथम मार्ग जो डुमरा रेलवे स्टेशन के बगल से होकर गुजरता है उस मार्ग की बाधाएं अप्रतिम है। धूल सिक्त, गड्ढा युक्त, कंकरीली, पथरीली सड़क आपके शारीरिक क्षमताओं का इम्तिहान लेती है। बीच-बीच में पानी से भरे हुए गड्ढे आपके वाहन चलाने की क्षमता का आकलन करते हैं। इन सबको पार करने के बाद, आप बाजार के ऐसे मोड़ पर पहुंचते हैं, जिस मोड़ से बाजार में घुस जाने के बाद, बाजार की भीड़, दुकानों के आगे रखे हुए सामान और इधर-उधर से निकलते लोगों को पार करने में आपके आत्म संयम और दृढ़ता की परीक्षा हो जाती है।
दूसरा रास्ता जंगली महादेव मंदिर से होकर जाने वाला रास्ता है। भारत भर में यदि आप भ्रमण करेंगे तो आपको सोमनाथ, विश्वनाथ, संकट हरण त्रिलोचन इत्यादि महादेव मिलेंगे। परंतु डुमरांव की धरती पर आने के बाद महादेव भी जंगली हो गए। हर हर महादेव। इस मार्ग की भी महिमा अनंत है। मुख्य मार्ग के समान ही पथरीली सड़क, अपने संकरेपन के साथ नागिन की तरह बलखाती आगे बढ़ती रहती है। इस मार्ग पर सबसे बड़ा खतरा सामने से आ जाने वाले ट्रक व ट्रैक्टर होते हैं। मार्ग के दोनों तरफ पत्थर की मजबूत दीवारे हैं जो इस संकरे मार्ग से निकालने वालों के भाग्य, कौशल और धैर्य का इम्तिहान लेती है। महादेव की असीम अनुकंपा से यदि बिना किसी ट्रक व ट्रैक्टर का सामना किया आप संकरे मार्ग से निकलकर चौड़े मार्ग पर पहुंच भी जाते हैं तो भी उस मार्ग का स्वरूप वैसा ही कंकरीला पथरीला बना रहता है। यह मार्ग घनी बस्तियों से होकर गुजरता है जिसके बाशिंदे जान हथेली पर लेकर रास्ता पार करते हैं,आते जाते हैं। इस मार्ग का आनंद यह है कि रेट्रो वीडियो गेम के शौकीनों को रोड फाइटर का गेम याद आ जाता है। बचपन की यादें ताजा हो जाती है।
तीसरा मार्ग पवन वेग से आने वाले हाईवे के यात्रियों के लिए सबसे रुचिकर मार्ग है। बड़का ढकाईच से अनुमंडल न्यायालय तक जाने वाला यह मार्ग भी अपनी अलग खूबी और पहचान रखता है। इस मार्ग पर कंकरीली पथरीली गड्ढा युक्त टूटी फूटी सड़क के अतिरिक्त अन्य भी कई ऐसी खूबियां हैं जो इस मार्ग पर आपकी यात्रा को रोमांचक बनाती है। रेलवे क्रॉसिंग और आधे तिरछे गड्ढे बाधा दौड़ का आनंद देते हैं।
इस मार्ग का सबसे बड़ा आकर्षण अकालूपुर की पुलिया थी। पुलिया का अपना ऐतिहासिक महत्व था। नहर पर बनी यह पुलिया बड़का ढकाईच से आने वाले रास्ते को दूसरी तरफ अनुमंडल जाने वाले रास्ते पर से जोड़ती थी। प्रारंभ में जब पुलिया का निर्माण हुआ होगा तब पुलिया के दोनों तरफ मुंडेर या रेलिंग बनी थी, जो पुलिया के नीचे बहती नहर में वाहनों के गिरने का खतरा समाप्त करती थी और वाहन चालक को वाहन नियंत्रित रखने में सहायता प्रदान करती थी।
परंतु हमारे देश के महान ट्रक चालकों ने इसे अपनी सीमाओं का उल्लंघन माना और अपने रास्ते के अवरोध को वह अपने ट्रक की मजबूत बॉडी से रगड़ रगड़ के नष्ट करते गए। जिन दिनों से मैंने इस पुलिया को जाना सुना इस पुलिया पर मुंडेर या रेलिंग के अवशेष मात्र ही बचे थे, जिसे भी आने वाली बड़ी ट्रकों अपने संविधान प्रदत्त यातायात की स्वतंत्रता के अधिकार में बाधा समझा और रगड़ कर तोड़ दिया। अंततः यह पुलिया मुंडेर विहीन हो गई।
अनुमंडल, अनुमंडल न्यायालय व बिहार मिलिट्री अकादमी पहुंचने के प्रयास में कितनी ही महान आत्माओं ने इस स्थान पर अपने प्राण न्योछावर किए। लेकिन जिला प्रशासन ने संवेदनहीनता दिखाते हुए इस स्थान पर शहीद स्मारक ना बनाया।अपितु नहर में जल के शाश्वत अभाव को ध्यान में रखकर, इस पुलिया की ऐतिहासिकता को नष्ट करते हुए, सूखी हुई नहर के बीच में से एक रास्ता बना दिया जो बड़का ढकाईच से आने वाले रास्ते को नहर में से उतरते हुए ऊपर चढ़ते हुए अनुमंडल जाने वाले रास्ते में जोड़ देता है।
इस मार्ग को सुगम रखने के लिए इस पर कच्ची ईंटों के टुकड़े डाल दिए गए जिससे यह रास्ता दलदल के रूप में परिवर्तित ना हो जाए। परंतु भारत की ऐतिहासिक ट्रक परंपरा के महान ट्रकों ने अपने ऐसे जौहर दिखलाएं कि यह पूरा रास्ता मिट्टी में चूर्ण चूर्ण परिवर्तित होकर महान घाटी में परिवर्तित हो गया है। इसमें उतरने पर धूल का ऐसा बवंडर उठता है, जो वाहन को चारों तरफ से घेरलेता है। व्यक्ति न आगे देख पाता है ना उसे पीछे का कुछ दिखाई पड़ता है। इस बवंडर में टेढ़े-मेढ़े हुए रास्ते पर कभी-कभी ऐसा महसूस होता है कि गाड़ी एक तरफ झुककर गिर जाएगी तो कभी लगता है दूसरी तरफ गिर जाएगी। कभी-कभी ऐसी घटनाएं होती हैं कि इस खतरनाक रास्ते पर आगे बढ़ते हुए, आगे से आने वाला ट्रक, धूल के उस बवंडर में गहरा ब्रेक लगाकर, धूल का ऐसा तूफान खड़ा करता है, जिससे सब कुछ स्थगित हो शांत हो जाता है। और प्राण कंठ तक आकर अद्भुत अनुभूति प्रदान करते हैं। इन सारी अनुभूतियों को संजोकर, व्यक्ति न्यायालय में पहुंचता है।
डुमरांव अनुमंडलीय न्यायालय की ये राहें इस बात को सिद्ध करती है कि न्याय की डगर आसान नहीं होती और कई बार न्याय के साथ ही साथ न्यायालय की भी डगर आसान नहीं होती।
-----
प्रियदर्शी प्रतीक
डुमरांव
23.04.2026
*कृपया हास्य व्यंग्य को हास्य व्यंग्य रूप में ही पढ़े। धन्यवाद*
Comments