दरख़्त का बूढ़ा होना
जर्द चेहरे में सुकून का फ़लसफ़ा होना
छूटती डोर देखने का हौसला होना
उम्र गुजरी है जिसके साये में
सालता है उस दरख़्त का बूढ़ा होना।।
जिनकी छांव तले खेल के बचपन बीता
जिनके नाम से दुनिया ने पहचाना था
शाख जो झूला थी, घोंसला औ सहारा थी
सालता है उस शाख का सूखते जाना।।
सबकी राहत औ सुकून का आशियाना इक
परिंदों का ठौर, पड़ाव वो मुसाफ़िर का
चमन के गुलों औ बुलबुलों की वो एक कड़ी
सालता है खिले फूल का मुरझा जाना।।
दुनिया जहां में सब कुछ जाना-सुना गया है
इस मृत्युलोक में तो जीवन है एक बहाना
आया जो इस जगत में, निश्चित है उसका जाना
पर सालता है मुझको माँ का नजर न आना।।
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प्रियदर्शी प्रतीक
डुमरांव, बक्सर
30.03.2026
(मौसी के निधन पर मौसेरे भाई साहब की लेखनी से प्रेरित)
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