भीड़ चीखती और भीड़ चिल्लाती जाती

भीड़ चीखती और भीड़ चिल्लाती जाती

खौफ के साये में मिचमिचाती आँखें 
शोर और दर्द से पथराती आँखें 
जुल्म की इंतेहा को देखकर के
डर के खुलती-बंद हुई जाती आँखें
देख, बर्बरता की खुशियां मनाती जाती
भीड़ चीखती और चिल्लाती जाती

सैकड़ों चेहरों से बनती भीड़ देखी 
एक चेहरा भीड़ का अब सामने था
देखने सुनने में था इंसान जैसा
किंतु उसकी पाशविकता क्रूरता
निर्दयी शैतान सा चेहरा बनाती 
भीड़ चीखती और भीड़ चिल्लाती जाती

कौन से आदर्श वो सिखला रहे है
किस तरह के मूल्य गढ़ते जा रहे है
पाशविकता क्रूरता से लबरेज जनता
नृशंसता के उत्सव में डूब करके
शुभ्र मानवता की खिल्ली है उड़ाती
भीड़ चीखती और भीड़ चिल्लाती जाती

अधर्म करती धर्म की वो आड़ लेकर
मध्य युग की मूढ़ता को श्रेय देकर
मौत देकर मौत का उत्सव मनाती
फिर पाप को पुण्य से बेहतर दिखाकर
पैरों तले इंसानियत कुचलती जाती
भीड़ चीखती और भीड़ चिल्लाती जाती

मज़हबी तकरीर से बेबाक होकर
तालिबानी शरीयतों से लैस होकर
कुफ़-कुफ़्र कुफ़्र-कुफ़्र कुफ़्र कहके 
इंसानियत को मजबूर औ लाचार करके
कत्ल कर हैवानियत के रंग दिखाती
भीड़ चीखती और भीड़ चिल्लाती जाती

वो भीड़ किस दुर्भावना की प्रतिनिधि है
मानवीय दुर्गुणों से अटी पड़ी है
संवेदना और चेतना से हीन जन को
कैसे "प्रियदर्शी" इंसानी भीड़ बोले
जो ठहाके, चीख -आंसू पर लगाती 
भीड़ चीखती और भीड़ चिल्लाती जाती


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प्रियदर्शी प्रतीक 
20.12.2025
डुमरांव, बक्सर

(बांग्लादेश में एक व्यक्ति स्व श्री दीपू चंद्र दास की हिंदू धर्मावलंबी होने के कारण,भीड़ द्वारा बर्बरता पूर्वक हत्या करके पेड़ से लटकाकर जला देने की घटना पर)

Comments

Anonymous said…
बहुत मार्मिक चित्रण
Anonymous said…
सामायिक और सबल कृति.
Anonymous said…
मर्मस्पर्शी प्रस्तुति

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