ज़िंदगी एक सफर है और मैं हमेशा लेट होता हूँ

ज़िंदगी एक सफर है और मैं हमेशा लेट होता हूँ

ज़िंदगी एक सफर है सुहाना
हमने सीखा इसे गुनगुनाना
गुनगुनाते हुए जीने में आता है मजा
मज़े मज़े में होश खो मदहोश होता हूँ
ज़िंदगी एक सफर है और मैं हमेशा लेट होता हूँ।।

जिंदगी में मची हुई है आपाधापी
लाइन लगाने की- कभी लाइन से आगे जाने की बेताबी
ज़िंदगी के परमाणु में सब इलेक्ट्रॉन बन घूमते है
मै उसके केंद्र (nucleus) में न्यूट्रॉन सम सोता हूँ
ज़िंदगी एक सफर है और मैं हमेशा लेट होता हूँ।।

ज़िंदगी क्या सिर्फ है एक दौड़
आदमी की जिंदगी है या टाइम लाइन की होड़
पढ़ता हूँ समय सापेक्षता पर आइंस्टींन का शोध
कछुये- खरगोश की दौड़ में, खरगोश होता हूँ
ज़िंदगी एक सफर है और मैं हमेशा लेट होता हूँ।।

ज़िंदगी के है अपने फलसफ़े
कुछ खुल के, कुछ बंधनों में है जिये
वो समझते है बंधन को ही अनुशासन
मौज के अनुशासन में जिंदगी जीता हूँ
ज़िंदगी एक सफर है और मैं हमेशा लेट होता हूँ।।

----
प्रियदर्शी प्रतीक
डुमराँव, बक्सर
05.08.2025

Comments

Anonymous said…
Superb 👌🏻

Popular posts from this blog

भीड़ चीखती और भीड़ चिल्लाती जाती

Budhha: Some thoughts on his Sculpture at Sanchi

Ecstasy of Blissfulness: Sadhguru