श्रीरामचरितमानस: शंका समाधान
#श्रीरामचरितमानस के संबंध में अनेक प्रकार के मत व चर्चाएं पढ़ने सुनने को मिल रही हैं।
अनेक चौपाइयों व दोहों को सामने रखकर विभिन्न प्रकार के दोषों का आरोपण मानस पर किया जा रहा है।
मुझे लगता है #बालकांड का #दोहा_संख्या_6 लोगों द्वारा इस संदर्भ में ध्यान में रखा जाना चाहिए:---
दोहा
जड़ चेतन गुन दोषमय बिस्व कीन्ह करतार।
संत हंस गुन गहहिं पय परिहरि बारि बिकार॥6॥
भावार्थ-
विधाता ने इस जड़-चेतन विश्व को गुण-दोषमय रचा है, किन्तु संत रूपी हंस दोष रूपी जल को छोड़कर गुण रूपी दूध को ही ग्रहण करते हैं॥6॥
व्यक्ति से अपेक्षा होती है कि वो दोषों को छोड़कर गुण ग्रहण करेगा।
सोचने वाली बात है कि जब विधाता ने इस विश्व की रचना की तो स्वयं विधाता भी इसे सिर्फ़ और सिर्फ़ गुणों से भरपूर नहीं बना सका। उसमें दोष भी आ गये। तो किसी ग्रन्थ में किसी को कोई दोष नज़र आ जाये तो बहुत आश्चर्य वाली बात नहीं होनी चाहिए। जब ईश्वर के रचित संसार में दोष दिख जाते है तो ईश्वर रचित मनुष्य की रचना में दोष दिखाये जाने पर आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
आज के विश्व मे किसी भी ग्रन्थ की निरपेक्ष टीका देखने पर ग्रन्थ के गुणों के साथ कई दोष भी सामने दिखायी पड़ जाते है। तो ऐसे में क्या होना चाहिए, व्यक्ति उस ग्रन्थ के संदर्भ में क्या करे, इसका निर्धारण ऊपर लिखें दोहे से हो जाता है।
"संत हंस गुन गहहिं पय परिहरि बारि बिकार" संत जैसा विवेक इस्तेमाल करें और अमृत पान करें।
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प्रियदर्शी प्रतीक
17.02.2023
दलसिंहसराय
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