#तालिबान की बर्बरता, दमन और अशांति में गाँधी जी की प्रासंगिकता#

#तालिबान की बर्बरता, दमन और अशांति में गाँधी जी की प्रासंगिकता#

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अफगानिस्तान में संकट की इस घड़ी में गांधीजी और उनका दिखलाया हुआ अहिंसात्मक असहयोग व विरोध का मार्ग इस प्रकार प्रासंगिक हो सकता है,  यह कोई सोच भी नहीं सकता था। 

विगत कुछ दिनों से जिस प्रकार से तालिबान की वापसी की खबरें समाचार में अपनी जगह बनाने लगी और देखते ही देखते अफगानिस्तान के प्रमुख शहर और अंततोगत्वा राजधानी काबुल तालिबान की गिरफ्त में आई, वह कुछ दिन पहले कल्पना से परे की बात थी। अफगानिस्तान की फौज और प्रशासन ने तालिबान के सामने आत्मसमर्पण सा कर दिया। वहां के राष्ट्रपति अपनी स्वयं की सुरक्षा के उपायों को करते हुए देश छोड़कर भाग चलें। राजधानी छोड़ने की अफरातफरी में भागते हुए लोग, वायुयान में किसी प्रकार जगह बनाने के लिए आतुरता, उड़ान भरते विमान से गिरते हुए मानव शरीर इस बात का अंदाजा लगाने के लिए काफी है कि एक आम आदमी के मानस पटल पर इस समय क्या चल रहा होगा।

तालिबान की क्रूरता और भयावहता को बतलाने  की कोई जरूरत नहीं,  साथ ही यह भी समझाने की कोई जरूरत नहीं कि तालिबान के नियमों व रीति-रिवाजों की जद में आने वाला पीड़ित वर्ग,  महिलाओं व धार्मिक अल्पसंख्यकों का ही होगा। 

ऐसे में, जो खबर बाहर आई वह अचम्भित करती है। पहली खबर यह रही कि काबुल के एक हिंदू मंदिर के पुजारी ने तालिबान के डर से अपना मंदिर व देश से छोड़ने से इंकार कर दिया और यह कहा यदि तालिबान उसे मार भी डालता है तो यह समझेगा कि यह उसके द्वारा अपने भगवान को दी गयी एक सेवा है। दूसरी खबर, जो हमे झकझोरती है वह यह है कि दोपहर में काबुल की सड़क पर अचानक से 7 महिलाएं हाथ में तालिबान की नीतियों के विरोध के तख्ते लिए मीडिया के सामने खड़ी हो जाती है। तालिबान वैश्विक मीडिया के सामने इस्लामिक कानूनों के अंतर्गत महिला सुरक्षा से संबंधित वक्तव्य जारी करता है। यह भले ही बड़ी उपलब्धि न लगे पर बड़ी उम्मीद अवश्य है।

यह सोचने की बात है कि ऐसे माहौल में जब हथियारबंद फौजें हथियार डाल चुकी हो, प्रशासन नतमस्तक हो चुका हो तो वह कौन सी ऊर्जा है, वह कौन सी शक्ति है जो सबसे कमजोर आंके जाने वालों को सबसे ज्यादा है शक्तिमान बनाकर दुर्दांत आतताइयों के सामने डट जाने को प्रेरित करती है। निश्चित रूप से वह "सत्य" व "धर्म" है।आतताईयों से बिना डरे, हौसले के साथ अत्यंत ही भयभीत करने वाले माहौल में, अपने पंथ पर, अपनी जगह पर खड़े होना, यही वास्तविक गाँधी दर्शन है।

तालिबान को रोकने के लिए, समाप्त करने के लिए, हथियार का प्रयोग विगत 20 सालों से इस विश्व की महाशक्ति ने करके देख लिया। परंतु आज फिर देखिए सैनिक शक्ति के लुप्त होते हैं तालिबान फिर सर उठा के खड़ा हो गया। अमेरिका के राष्ट्रपति यह कहते हुए पाये जाते है कि अमेरिकन फ़ौजें अफगानों की लड़ाई नही लड़ सकती वो उन्हें स्वयं लड़नी होंगी। ऐसी हालत में नागरिकों के सामने जो सैनिक शक्ति के साथ तालिबान का मुकाबला नहीं कर सकते सिर्फ दो ही विकल्प बचते हैं:--

पहला, यह कि वह तालिबान की नीतियों व नियमों के अनुसार ढल जाए और अपने आप को और अपने राष्ट्र को गर्त में जाता हुआ देखें। और दूसरा रास्ता वह है जो गांधी जी ने सिखाया है। जो आज काबुल की सड़कों पर तालिबान की ताकत से बेखौफ होकर, अपनी बात सामने रखकर, वहां की महिलाओं ने दिखाया है। परिस्थितियां देखकर, एक उम्मीद जगती है, एक रास्ता दिखता है, जो कभी गाँधी जी ने अफ्रीका में और फिर भारत में पराधीनता की बेड़ियों में जकड़े, परास्त से हो चुके जन मानस को दिखाया। एक उम्मीद बंधती है कि यदि अफगानिस्तान की प्रजा इस रास्ते पर चलने की हिम्मत दिखाये तो शायद कभी शांति और मानवता का सूरज उग सकता है। तालिबान झुक सकता है, बदल सकता है, परास्त हो सकता है।

और इन्हीं कारणों से मुझे सुखद आश्चर्य है कि युद्ध, अमानवीयता व बर्बरता के ऐसे वातावरण में, इन विभीषिकाओं में भी गांधीजी और उनका दिखाया हुआ मार्ग प्रासंगिक है।

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प्रियदर्शी प्रतीक

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