कुदरत और कोरोना
बेतरतीब सा मंजर है, ठहर तो लीजिए
साँसे उखड़ रही है, आसरा तो दीजिए
कुदरत की नेमतों का मोल गर समझ चुके
तो खींचकर एक साँस फेफड़ो में लीजिए।
बेबसी-लाचारी फ़िजां में भरी पड़ी
ताक़त की दौड़ दुनिया को भारी बहुत पड़ी
बोतलबंद पानी की आदत अभी पड़ी थी
अब फेफड़ों में ऑक्सिजन सिलेंडर से लीजिए।
सब कह रहे है कि ये निराशा का दौर है
तड़पती आस- टूटती साँसों का शोर है
पर शायद वो कह रहा कि तुम ठहर रहो
कभी तुममें ज़ोर था, अभी उसका ज़ोर है।
ताकत की अंधी दौड़ ने कोरोना बना दिया
रुपया सहेजने में ही जीवन गँवा दिया
प्रकृति से उलट चलकर, हम खुश बहुत हुए
इस आपदा की चोट ने आईना दिखा दिया।।
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प्रियदर्शी प्रतीक
21.04.2021
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