"अफ़साना-ए-हक़ीक़त"


वक़्त और बेवक़्त के साँचे तो दुनियावी है,
अल्पना में हर रंग उसकी तासीर का ही होगा।।

बेवक़्त के अंधड़ से बेनूरी सी तो छायेगी
पर खुशबू से तेरी, गुलशन ये, शादाब रहेगा।।

हर एक मुसाफिर की है अपनी इक कहानी,
जीते है जिसे सब वो अफ़साना रहा होगा।।

नाम आते ही चमक उठती है अगनित आँखे,
तेरी मुस्कान का हर शख्स दीवाना रहा होगा।।

बाद मुद्दत के, खुद से रूबरू होने लगा है वो,
पहचान खोजने को, सफ़र में चला होगा।।

सब उसको समझते है मुकद्दर का बादशाह,
अफ़सानों को गढ़ने का हुनर भी रहा होगा।।

मंज़िलो की आस थी, या खुद की तलाश थी,
मंज़िलो को पड़ावों में बदलता चला होगा।।

प्रियदर्शी, उसकी याद की जुम्बिश है साँसों में,
थमने पर उसके, अफ़साना-ए-हक़ीक़त चला होगा।।

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प्रियदर्शी प्रतीक

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