क्यों रिक्शावाला रोता है

प्रलय वाहिनी सी दिखती,
गंगा की निर्मल जलधारा
वर्षा का ऐसा रौद्र रूप
जलप्रलय नगर में कर डाला

पानी पानी हर ओर हुआ
जीवन अवरुद्ध सा होता है
जल के कौतुक वर्षा का रूप
मन खीझे और खुश होता है

झंझावातों में एक दृश्य
शूल हृदय में चुभोता है
आकंठ पानी में डूब खड़ा
एक रिक्शावाला रोता है।।1।।

प्रतिक्षण बढ़ते जलस्तर में
शक्ति समस्त-धारा विरुद्ध
जीवन के संसाधन फिरभी
छूटे जाए प्रकृति निरुद्ध

शासन के स्याह रहस्यों की
सामाजिक ताने-बाने की
विवश हुए श्रमजीवी की
पीड़ा सर्वस्व बचाने की

लुटते भविष्य को पास देख
मन जार-जार जब होता है
तब श्रमजीवी संघर्षशील
एक रिक्शावाला रोता है।।2।।

क्या सजल नयन हो गए सभी
शासन की आंखें भर आई
क्या सत्ता के आस्थानों ने
समझी पीड़ा की गहराई

क्रूर नियति की दे दुहाई
दिखला वर्षा की निठुराई
कर्तव्यों की इतिश्री करने की
परंपरा चलती आई

जिस पर बीते वो ही जाने
विपदा में क्या-क्या होता है
अपना भवितव्य बचाने को
एक रिक्शावाला रोता है।।3।।

कैसी समाज की संरचना
कैसी विकास की चूलें हैं
पूंजीवाद की लक-दक में
हम श्रमजीवी को भूले हैं

क्या है समाज की सार्थकता
क्या अर्थशास्त्र कैसा विकास
जब प्रकृति निरुद्ध श्रमजीवी का
रुँधा हो कंठ, टूटी हो आस

कोई नगर देवता किसी भाँति
क्या खोज खबर भी लेता है
श्रम पर आश्रित, श्रम पर पोषित
एक रिक्शावाला रोता है।।4।।

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प्रियदर्शी प्रतीक

(पटना शहर में भयंकर बारिश से उत्पन्न हुईं बाढ़ जैसी परिस्थिति में फंसे हुये एक रिक्शेवाले के आँसुओ से प्रेरित है ये रचना। जीवन रक्षा को आतुर व्यक्ति के आंसुओं से अधिक कातर वो आँसू है जो दैहिक रूप से सबल व्यक्ति की आँखों से अपनी श्रम की पूँजी लूटते देख फूट पड़ते है।)

Comments

Unknown said…
Bahut marmik hai..... Kya soch hai
N use bhi achha usko describe karna

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