गिट्टियां, गर्द और चारकोल
सुनी न जमीनी बात, कई मुद्दत बीती
आजकल तो हवाओं में ही बात होती है।
पैमाइश देशप्रेम की होने लगी जिधर देखो
कद्र मूरत की ऊंचाई से तय होती है।।
रौंदकर हरियाली बढ़ा जा रहा शहर देखो
दम थाम मेरे गाँव में पुरवाई छिपी बैठी है।
गिट्टियां गर्द चारकोल से लिपटी चिपटी
वो सड़क गाँव के चौके पे चढ़ी बैठी है।।
दिये से हुआ जगमग सदा मन्दिर मेरा
बिजली की झालर से तसल्ली नही होती है।
शहर की ऊंची इमारत औ चिमनियों को कहते हो विकास
तो साँस लेने पर क्यों इन गलियों में घुटन होती है।।
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प्रियदर्शी प्रतीक
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