निर्भया के दोषियों को दंड क्या सामाजिक कर्तव्यों की इतिश्री है???

अपराधी को मिला दंड, न्याय व्यवस्था में हमारे विश्वास को दृढ़ करता है। यह निश्चय ही स्वागत योग्य होना चाहिए। इससे न्यायिक कार्य निर्णायक बिंदु तक पहुँचता है। परन्तु दंड हो जाने से सामाजिक व्यवस्था के कर्तव्य की इति नही हो जाती। यदि समाजिक व्यवस्था में वो सभी कारक, जो अपराध के पीछे की चेतना है; अपराधी की प्रवृत्ति के जन्मदाता है, अपने समस्त प्रभाव के साथ समाप्त नही होते, तो दंड की व्यवस्था पर्याप्त नही है।

न्यायिक व्यवस्था सामाजिक व्यवस्था की पूरक तो हो सकती है परंतु किसी भी प्रकार से सामाजिक व्यवस्था का विकल्प नही बन सकती है।

प्राचीन काल के समाज और मानव के सामाजिक विकास को देखें तो हम पाएंगे कि  न्यायिक व्यवस्था सामाजिक व्यवस्था का एक अंग होती थी जो सामाजिक व्यवस्था में आने वाली रूढ़ियों को संवारने का कार्य करती थी। वर्तमान में हमने अपने संवैधानिक विकास के क्रम में जिन व्यवस्थाओं को अपनाया है उसमें समाज की व्यवस्था करने वाले नियम व उपनियम उन संस्थाओं व्यक्तियों द्वारा निर्धारित होते हैं जो समाज के अंतर व्यवस्थाओं से मेल नहीं खाते है।

हमारे वर्तमान समाज में धर्म को वह स्थान नहीं दिया जा रहा जो पूर्व की सामाजिक व्यवस्था में था। मैं नहीं समझता मैं कहां तक सही हूं या गलत लेकिन मैं यह पाता हूं की पूर्व की सामाजिक व्यवस्था धर्म पर आधारित व्यवस्था थी धर्म एक व्यक्ति की चेतना ना होकर सामाजिक चेतना के रूप में रहता था, जो कहीं ना कहीं हमारे कार्यों को विचारों को उचित रूप देता था।

आज के समाज में धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत के उदय के पश्चात धर्म को व्यक्तिक चेतना बनाकर एक किनारे खड़ा कर दिया है। नियमित व्यवहार में धर्म का बहुत ज्यादा हस्तक्षेप नहीं रह गया है। यदि मैं अपने बचपन को याद करूं तो मैं यह पाता हूं की जब हाथ से एक चुटकी नमक भी जमीन पर गिर जाता था तो यह बात कही जाती थी की नमक को बर्बाद करने का दंड बाद में भगवान देंगे बरौनियों से नमक को उठाना पड़ेगा। यदि खेल खेल में तालाब में मेंढक पर पत्थर उछाल दिया तो यह समझाया जाता था की कान में भीषण दर्द होगा।

मैं यह नहीं कहता कि यह डर किस हद तक लोगों को उचित अनुचित का भेद कराने में कारगर रहा, लेकिन यह बात तो भलीभांति रुप से सिद्ध होती है कि अपराध की जो प्रवृत्ति आज देखने को मिल रही है वह उस रूप में पहले ना होती थी। हमें याद है डाकुओं के गिरोह हुआ करते थे जो अत्यंत भीषण अपराध करते थे लेकिन उनके भी चारित्रिक उज्ज्वलता के किस्से लोगों में मशहूर होते थे।

आज धर्म को जिस तरीके से सामाजिक व्यवस्था से काट दिया गया है वह कहीं ना कहीं सामाजिक पतन के लिए उत्तरदायी है। न्यायिक व्यवस्था के भरोसे हम समस्त समाज को नहीं छोड़ सकते क्योंकि न्यायिक व्यवस्था मूलभूत रूप से कार्य होने के बाद जागृत होती है। सामाजिक व्यवस्था से वह सामाजिक चेतना उत्पन्न होती है जो किसी व्यक्ति को वह कार्य करने से रोकती है जो हीन है, गलत है, पाप है।।

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