अंतर्वेदना

कसमसाना
टूटना
तोड़ना
मरोड़ना
फिर हार जाना, फिर से कोशिश
कि जोड़ सके, मन के तार 
खुद से
जन से
दुनिया से
परिवार से

कसमसाना
टूटना
तोडना
मरोड़ना

फिर हार जाना, फिर से कोशिश
कि खोल सके, आत्मा के द्वार
विचार के लिए
व्यवहार के लिए
समाज के लिए
संसार के लिए

कसमसाना
टूटना
तोडना
मरोड़ना

फिर
रुकना
ठहरना
बैठना
सोचना
कि
क्यों ऐसे टूटा
अंतर का तार
जो नजर में नही आता
छिपता छिपाता
उधेड़ देता सब कुछ
दम घोंट देता,
कर देता बेजार

कसमसाना
टूटना
तोडना
मरोड़ना

फिर समझना
कि यही सत्य है
दुनियावी व्यवहार
यही सफर है
अपेक्षा से उपेक्षा
तक
निरंतर अविराम
सबके अपने रावण
अपने अपने राम

कसमसाना
टूटना
तोडना
मरोड़ना

फिर
डूबना याद में
जीवन के उत्तरार्ध की
और 
विवेचना
कि

आचार सदाचार व्यवहार
सब सिखाती
ये पाठशाला
किताबों चॉक और डस्टर वाली
कराती नही
अंतर का साक्षात्कार

मन की गुत्थियां
विचार और व्यवहार
अंतर की गहराइयों में
करते हिलोड़
जार जार करते
मन को
मिलता यही निचोड़

बचपन की पाठशाला में
याद रखना मुश्किल
भूलना आसान है
जीवन की पाठशाला में
भूलना मुश्किल
और याद का नही
कोई ओर छोर

जीवन की यात्रा में
क़दमताल करते
हर मोड़ पर होते
अपेक्षाओं के दौर
उपेक्षाओं  के  ठौर

कसमसाना
टूटना
तोडना
मरोड़ना

फिर
समझना कि काश
मन की स्लेट पर
जो चॉक चलती
वो धुलती
चलती
न छोड़ती कोई छाप

मोह न पलता
अंतर्मन में
न जगती कोई आस
न विश्वास
तो
शुभ रहते दिन
शांत बीतती रात

न होती
कोई अड़चन
न होता
तड़पना

न ही फिर से
कसमसाना
टूटना
तोडना
मरोड़ना

-------प्रियदर्शी

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