गंगा

आज फिर गंगा के तट पर
वर्षो पुरानी सभ्यता के आँचल में लिपटी जिंदगी का साक्षात्कार करके लौटा हूँ ,

देखता हूँ कि
गंगा को मैया कहने वाले कंहा तक संजो रहे है अपनी विरासत को,

आरती की तैयारियां,घंटियों का शोर;
शंख की ध्वनि और श्लोको की गुंजन,
अभिभूत पर्यटक, प्रवासी,अप्रवासी व देशी जनता
हर हर महादेव का निनाद...जन जन विभोर...........

पर क्यो नही कोई देख पाता उस माता का दुःख
जिसके हेतु है सारा आयोजन,सर्जन..

गंगोत्री की धवल धारा का कुत्सित रूप सांझा के धुंधलके में छिपा कर
दीपों व प्रकाश मलिकयो का मंच रचकर
क्या सिर्फ़ मनोरंजन हेतु है यह सारा संयोजन.

क्यो नही देख पाते
उन मल व त्याज्य पदार्थो के ढेर को
क्या घटित होता है मन में 
जो आस्थाओ का संकुचित रूप धरकर,
पुण्य पाने की होड़ में मोक्षदायिनी को विकारयुक्त बनने में धर्मभीरु भी करता है सहयोग......

फिर से मंथन करना होगा
अपनी आस्थाओ पर,संस्कारो पर, प्रतीकों पर...

सोचना होगा की............
"किस बात की हो वर्जना , कैसे करे आराधना;
क्या हेतु है क्या मूल है,होती भयंकर भूल है;
जो आज ना चेतेगा जन, तो धर्मं का होगा पतन....."

स्वच्छता आह्लाद दे, युगधर्म का प्रसाद दे;
आडम्बरो से मुक्ति हो, दर्शन की व्युत्पत्ति हो,
ना धर्मं का अवसान हो, हरओर फिर यश गान हो;
गंगा से सच्ची प्रीत हो,यह सदभक्ति का यही प्रतीक हो..."

Comments

नीरजः said…
Very good. Nice presentation but I will not divert the attention from the message you want to convey. We all know something must be done but we don't know what to do or probably we know but we don't know how to start.

Thanks buddy, for the company. Now I am not alone at least to think about these issue. And I am sure we will do something. We will not let this thought die.

Ganga maiya ki jai. Har har mahadev

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